आज "दीपावली" है। दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लासपूर्ण था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए । कार्तिक मास की घनघोर काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। अधिकतर यह पर्व ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्तूबर या नवंबर महीने में पड़ती है। दीपावली दीपों का त्योहार है। इसे दीवाली या दीपावली भी कहते हैं। दिवाली अन्धेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दिवाली यही चरितार्थ करती है - असतो माऽ सद्गमय , तमसो माऽ ज्योतिर्गमय।धर्म, जात - पात को एक तरफ़ रख कर हिन्दुस्तान को एक सूत्र के पिरोने की कोशिश....
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शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
दीपावली क्या है?? सारे हिन्दी ब्लोग्गर्स को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें...!! What Is Deepawali??? A Very Happy Deepawali To All Hindi Blogger's..!!
आज "दीपावली" है। दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लासपूर्ण था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए । कार्तिक मास की घनघोर काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। अधिकतर यह पर्व ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्तूबर या नवंबर महीने में पड़ती है। दीपावली दीपों का त्योहार है। इसे दीवाली या दीपावली भी कहते हैं। दिवाली अन्धेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दिवाली यही चरितार्थ करती है - असतो माऽ सद्गमय , तमसो माऽ ज्योतिर्गमय।
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मंगलवार, 5 मई 2009
यह कैसी आस्था???
हमारे भारत देश का इतिहास सदियौं पुराना है, यहाँ बहुत सी सभ्यताएं, संस्कृतियाँ और धर्म मौजूद हैं हमारे भारत का सबसे बड़ा धर्म है "हिंदू धर्म" । हिंदू धर्म मे लगभग तेंतीस हज़ार देवी - देवता है जिनकी पूजा की जाती है, इस संख्या मे देवी देवताओं के सब अवतार शामिल है लेकिन आज के भारत के जो हालात है उसे देख कर ऐसा नही लगता की यहाँ पर लोगो के मन मे आस्था उस हद तक मौजूद है, क्यूंकि जो रवैया है आज के लोगो उससे लगता नही है की उन्हें किसी चीज़ की परवाह है, हम लोग ख़ुद अपने हाथो से सब कुछ तबाह कर रहे है... मैं आप लोगो को कुछ उदाहरण दे रहा हूँ अपनी बात साबित करने के लिए
हमारे देश गंगा नदी को "गंगा मैया" के नाम से पुकारा जाता है मैया का मतलब होता है "माँ" जन्म देनी वाली नही है लेकिन कुछ नहीं तो मुहँ बोली माँ तो है लेकिन हमने अपनी माँ का कितना ख़याल किया है अभी पिछले शुक्रवार को मैं कानपुर के गंगा पुल पे से गुजरा था तो देखा गंगा नदी एक पतले काले नाले के रूप मे दिख रही थी, उस दिन गगा मे कुछ लोग स्नान कर रहे थे पुल के ऊपर से देखने पर ऎसा लग रहा था कि वो लोग नाले मे नहा रहे है, यही हाल यमुना समेत भारत की तमाम नदियो की है . हमारे सारे धार्मिक रिति - रिवाज इन्ही नदियो से सम्बन्धित है, यह नही होगी तो अस्थियो का विसर्जन कहा होगा कभी सोचा है नही न इतना वक्त किसके पास है सोचने के लिये... सारे कारखानो का गन्दा पानी इन नदीयो मे बहाया जा रहा है हमारे सरकारी अफ़्सरो की बदॊलत, सारे धोबी वही कपडे धो रहे है, सारे जान्वर इन नदियो मे नहा रहे है, और हम क्या कर रहे है कुछ भी नही .
एक कथित "माँ" के बारे मे आपको और बताता हूँ यह "माँ" है "गौ" माता, जब भी "गौ" वध की बात आती है तो कुछ लोग बडा शोर - शराबा करते है, लेकिन यही माता जब सडको पर पन्नी - पौलिथीन खाती रेह्ती है, आवारा घूमती है, कुत्ते और इन्सान दोनो उसे मारते है, वो भुखी - प्यासी घूमती है, तब यह लोग किधर होते है, शोर सब मचाते है अख्बार मे तस्वीर छ्पवाने के लिये, अपना नाम छ्पवाने के लिये, लेकिन जब इस माता के लिये कुछ करने की बात आती है तो बस सब वादे करते है...
अब आप लोग ही बताये "यह कैसी आस्था है?"
हमारे देश गंगा नदी को "गंगा मैया" के नाम से पुकारा जाता है मैया का मतलब होता है "माँ" जन्म देनी वाली नही है लेकिन कुछ नहीं तो मुहँ बोली माँ तो है लेकिन हमने अपनी माँ का कितना ख़याल किया है अभी पिछले शुक्रवार को मैं कानपुर के गंगा पुल पे से गुजरा था तो देखा गंगा नदी एक पतले काले नाले के रूप मे दिख रही थी, उस दिन गगा मे कुछ लोग स्नान कर रहे थे पुल के ऊपर से देखने पर ऎसा लग रहा था कि वो लोग नाले मे नहा रहे है, यही हाल यमुना समेत भारत की तमाम नदियो की है . हमारे सारे धार्मिक रिति - रिवाज इन्ही नदियो से सम्बन्धित है, यह नही होगी तो अस्थियो का विसर्जन कहा होगा कभी सोचा है नही न इतना वक्त किसके पास है सोचने के लिये... सारे कारखानो का गन्दा पानी इन नदीयो मे बहाया जा रहा है हमारे सरकारी अफ़्सरो की बदॊलत, सारे धोबी वही कपडे धो रहे है, सारे जान्वर इन नदियो मे नहा रहे है, और हम क्या कर रहे है कुछ भी नही .
एक कथित "माँ" के बारे मे आपको और बताता हूँ यह "माँ" है "गौ" माता, जब भी "गौ" वध की बात आती है तो कुछ लोग बडा शोर - शराबा करते है, लेकिन यही माता जब सडको पर पन्नी - पौलिथीन खाती रेह्ती है, आवारा घूमती है, कुत्ते और इन्सान दोनो उसे मारते है, वो भुखी - प्यासी घूमती है, तब यह लोग किधर होते है, शोर सब मचाते है अख्बार मे तस्वीर छ्पवाने के लिये, अपना नाम छ्पवाने के लिये, लेकिन जब इस माता के लिये कुछ करने की बात आती है तो बस सब वादे करते है...
अब आप लोग ही बताये "यह कैसी आस्था है?"
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