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शनिवार, 13 जून 2009

कुरआन का हिन्दी अनुवाद (तर्जुमा) .MP3 फ़ोर्मेट मे..। Download Quran (Kuraan) Hindi Translation In .MP3 Format

आप सब लोगो के लिये काशिफ़ कि तरफ़ से एक तोह्फ़ा। मैने पुरे एक महीने की मेहनत के बाद कुरआन के हिन्दी अनुवाद (तर्जुमा) के .MP3 फ़ोर्मेट को मै इन्टरनेट पर अपलोड कर पाया ताकि इस को ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक पहुचा सकुं और जो मुस्लिम और गैर-मुस्लिम भाई अरबी भाषा नही जानते है वो कुरआन और इस्लाम के सही मतलब और मक्सद को समझ सके। तहे दिल से कुबुल करें कि कुरआन अल्लाह का कलाम है और अल्लाह के सिवा कोई पूज्ने यौग्य नही।






मैने इस अनुवाद को सात टुक्डों ZIP File की शक्ल मे इन्टरनेट पर अपलोड किया है। इन सातों टुकडॊं को आप यहा दिये गये लिन्क के द्वारा अपने कंप्युटर मे डाउनलोड कर ले। फिर इन्हे UNZIP कर के इन्हे सुने, इस्मे पहले कुरआन की आयत की तिलावत कि गयी है फिर उसका अनुवाद किया गया है। हर फ़ोल्डर के नाम मे उन आयात का पारा नंबर दिया गया है। हां इस तर्जुमे मे आयत नंबर नही दिया है क्यौंकी आयत नंबर देने के बाद ये एक सही सीरियल से आपके .MP3 Player कि Playlist मे नही चलेगा। इसीलिये इसे अलग नंबर दिये हुए है लेकिन जहां कोई नयी आयत शुरु हो रही है वहा - वहा उस आयत का नाम दिया गया है।

डाउनलोड करने के लिये यहां क्लिक करें।

शुक्रवार, 29 मई 2009

कब्रों की ज़ियारत किस लिये?

मुझ से यह सवाल हमारे एक भाई मे ई-मेल से पूछा था तो मै उस्का जवाब यहा दे रहा हू ।

सवाल :- कब्रों की ज़ियारत मज़ारों से वसीला लेना और (चढावे के तौर पर) वहां माल और दुंबे आदि ले जाने का क्या हुक्म है? जैसा कि लोग सय्यद अल-बदवी (सुडान में), हज़रत हुसैन बिन अली रज़ि ॒ (इराक में), और हज़रत जैनब रज़ि ॒ (मिस्र) कि कब्रों पर करते हैं । आप जवाब दें, अल्लाह आप के इल्म में बरकत दे । आमीन






जवाब :- कब्रों के ज़ियारत की दो किस्में हैं । पहली किस्म वह है जो कब्र वालों पर रहम व मेह्र्बानी करने, उनके लिये दुआ करने, मौत को याद रखने और आखिरत कि तय्यारी के लिये कि जाये । यह ज़ियारत जाइज़ है और ऐसी ज़ियारत की आवश्यक्ता भी हैं । क्यौंकि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहिंं वसल्लम का फ़र्मान है ।

"कब्रों की ज़ियारत किया करो, इस लिये कि वह तुम्हें आखिरत की याद दिलाती हैं" आगे पढ़े...

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008

क्या इस्लाम और कुरआन मानवता और दया का संदेश देते हैं? Does Islam,And Quran Gives The Message Of Huminity???

सितम्बर को ab inconvenienti जी ने अपने ब्लॉग पर एक पोस्ट लिखी थी जिसका शीर्षक था...."कुरआन की इन आयतों की व्याख्या करे :..............(१)"

क्या इस्लाम और कुरआन मानवता और दया का संदेश देते हैं?
सर्वधर्म त्याग और धरमांतरण?

उन्होंने कुरआन की आयतों का अंग्रेज़ी अनुवाद दिया है, इन आयतों से ये जनाब यह साबित करना चाहते है की इस्लाम और कुरआन मानवता का संदेश नही देते हैं.....
मैं सबसे पहले उनको कुरआन के बारे मे कुछ बताना चाहता हूँ....
कुरआन किसी इंसान की लिखी हुई किताब नही है जो एक Sequence की तरह चलती है...... क्यूंकि इंसान जब भी लिखता है तो वो एक sequence मे चलता है की बहुत समय पहले की बात है यह हुआ, उसके बाद यह हुआ, फिर यह हुआ, कुरआन मजीद किसी इंसान की किताब नहीं है वो अल्लाह का कलाम है इसलिए उसमे कोई Sequence नही है, आप बाइबल पढिये, रामायण पढिये, महाभारत पढिये, यह सब Sequence मे है के पहले इसका जन्म हुआ, फिर उसकी मौत के बाद इसका जन्म हुआ, आदम अलेह्स्सलम का ज़िक्र "सुरह बकरा" में भी है, "सुरह आरफ" में भी है....लाइन से नही है.

कुरआन मजीद एक बार मे लिखी किताब नही है कुरआन लगभग २३ साल मे नाजिल हुआ है, और कई बार मोहम्मद साहब से जब लोगो ने सवाल किया तो अल्लाह के यहाँ से वही आई और जवाब आया... मौके का लिहाज़ रखते हुए एक एक करके २३ साल मे आयतें नाजिल हुई.....

इसीलिए कुरआन की एक आयत से आप इस्लाम और कुरआन की मानवता या दया का संदेश देता है या नही इसका पता नही चलता है.....

मैं यहाँ उनके द्वारा दी गई आयतों का हिन्दी तर्जुमा पेश कर रहा हूँ :

S. 2 : 27  जो अल्लाह के अहद को पक्का (वादा) करने के बाद भी तोड़ डालते है और (इंसानी सम्बन्ध) जिसके मिलाने का अल्लाह ने हुक्म किया है {उसको} तोड़ डालते है और मुल्क मे फसाद (उप्दर्व) मचाते हैं . (जभी तो इनपर यह जुर्म की सज़ा है की) यही लोग टूटा पाते हैं .


S. 2 : 39   और जो लोग (इस हिदायत की) निशानियाँ जुध्ला देंगे (वह हरगिज़ जन्नत मे न जायेंगे, बल्कि) वह आग के काबिल होंगे, हमेशा (के लिए) उसी मे रहेंगे .

S. 3 : 90-91   वह लोग जो ईमान लाने के बाद काफिर हुए फिर कुफ्र ही मे बढ़ते गए उनकी तौबा हरगीज़ कुबूल न होगी और यही लोग (असली राह से) भूले हुए हैं. बेशक जो लोग काफिर हों और कुफ्र की हालत मे मर जाएँ उनमे से किसी से ज़मीन भर कर भी सोना हरगीज़ कुबूल न होगा अगरचे (थोडी देर के लिए मान भी लें की ) वह अपना जुर्माना इतने से भी अदा करना चाहे । बल्कि उनको दुखदाई अजाब होगा और कोई भी उनका सहायक न होगा . 73
S. 4 : ८९   वह चाहते हैं की तुम भी उनकी तरह काफिर हो कर एक से हो जाओ पास तुम उन मे से किसी एक को भी मित्र न बनाओ जब तक वह घर छोड़ कर अल्लाह की राह मे न निकले और अगर (इस्लाम का दवा करने के बावजूद) उससे मुंह फेरे तो उनको पकडो और जहाँ पो कत्ल कर डालो और उनमे से न तो किसी को मित्र बनाओ और न हिमायती (बिल्कुल ही अलग हो जाओ)


S. 9 : 66     (बस अब) उज्र बहानेबाजी न करो तुम ईमान लाये पीछे काफिर हो चुके३७ (हो) अगर हम तुम मे से किसी एक पार्टी को माफ़ करें भी तो दूसरी पार्टी को ज़रूर ही अजाब देंगे, (जो इस फसाद के सरदार हैं ) क्यूंकि वही मुजरिम हैं।
S . 9 : 74    अल्लाह के नाम की कसमे खाते हैं की हमने यह बात नही कही हालांकि कुफ्र का कलमा (बात) कह चुकें हैं ४२ और इस्लाम लाने के बाद काफिर हो चुनके हैं और ऐसे काम का इरादा कर चुनके हैं जिस पर कामियाब नहीं हुए, और केवल उसी पर रंजीदा है की अल्लाह ने महज़ अपनी मेहरबानी से और रसूल ने (उस के हुकुम से) उनको गनी किया, फिर भी अगर तौबा कर लें तो उनके हक मे बेहतर होत और अगर मुंह फेरे रहेंगे तो अल्लाह उन्हें दुनिया और आखिरत मे दुःख की मार देगा, न कोई उनका (ज़मीन में) वली होगा और न कोई मददगार .


S. 47 : 25     जो लोग हिदायत मालूम हो जाने के बाद भी उल्टे पाँव (गुमराही के कुंवे मे) जाते हैं, शैतान ने उनको धोका दे रखा है और उनको बेहतरी की उम्मीद दिला रखीं है । (यह इस हद तक पहुचें हैं) की जो लोग अल्लाह के उतारे हुए कलाम को नापसंद करते हैं.


७३ . ज़मीन का उदाहरण आसानी से समझ जाने के लिए दिया है, क्यूंकि आदमी इसी पर रहता - बसता है । और सोने की मिसाल इसी लिए दी है की यह इंसान को सबसे अधिक प्यारा होता है । इब्ने कसीर ने फ़रमाया की इस का अर्थ यह है की जो शख्स काफिर हो कर मरा तो फिर उसकी कोई चीज़ कुबूल न होगी अगरचे उसने ज़मीन भर सोना भी ऐसे काम काम मे खर्च किया हो जिसको वह है की जिस सोने को इकठ्ठा करने मे मेहनत और मशक्कत की थी, उसके लिए दिन - रात एक कर दिया था, वह भी इस लायक नही है की आखिरत में उनके लिए कुछ काम आता, क्यूंकि दुनिया मे उन्होंने उसको उचित समय पर खर्च नही किया था, अर्थात उसे अल्लाह के आदेश के अनुसार प्रयोग नही किया, बल्कि या तो उसकी देख रेख ही करता रहा, या मुझ मस्ती ही मे मगन रहा । तो ऐ मुसलमानों ! तुम भी अगर ऐसा ही करोगे तो तुम्हारा हाल भी उन्ही जैसा होगा ( सानाई - हज़रात मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी रहमतुल्लाह )

३७ .  यह आयत मुनाफिको की एक जमात के हक मे नाजिल हुई जो नबी करीम की गीबत (बुराई) करते थे । जब उनसे कहा जाता की ऐसी बातें न करो, ऐसा न हो की उनको ख़बर पहुच जाए यह सुन कर जल्लास बिन सुवेद अथवा इब्ने हारिस वगेरह ने कहा की डरने की कोई बात नही, उम् लोग रसूलुल्लाह के पास जा कर कसमे खा कर कह देंगे की हमने कुछ नही कहा तो आप रसूलुल्लाह मान लेंगे क्यूंकि वो नीरे कान हैं । इस मौके पर एक अंसारी सहाबी आमिर बिन कैस राजिअल्लाहो मौजूद थे, उन्होंने नबी करीम के पास आ कर पुरी जानकारी दे दी, आप रसूलुल्लाह ने उन मुनाफिको को बुलाकर पुछा तो कसमे खा कर इनकार कर गए और यहाँ तक कह गए की ऐसी सूचना देने वाले पर अल्लाह की लानत हो । चूँकि अल्लाह के पाक नाम दरमियान मे ले आए थे इसलिए आप ने हज़रत आमिर अंसारी की बात पर धयान न दिया और मुनाफिको की कसमो पर यकीन कर लिया। हज़रत आमिर को इस बात से बहुत तकलीफ हुई और दुआ की की ऐ अल्लाह ! सच्चे को सच्चा और झूठे को झूठा साबित कर दे, इस पर यह आयत नाजिल हुई (इब्ने कसीर)
मोहम्मद बिन इसाक से रिवायत है की नबी करीम जब ताबुक के स्थान पर पहुचे तो मुनाफिको की एक जमात ने आपसे परे हट कर मुसलमान फौजियौं को डराना शुरू कर दिया और उनसे कहा की उन रूमियौं से लड़ना हँसी - खेल नही है, तुम सबको परजेय का मूंह देखना पड़ेगा और कैद कर लिए जाऊगे । इन बातों को कह कर उन्ही मे से कुछ लोग आपस मे कहने लगे की ऐसा न हो की हमारी बातों पर कोई आयत नाजिल हो जाए । यह लोग बात - चीत कर रहे थे की नबी करीम ने हज़रत अम्मार बिन यासिर को आदेश दिया की जाओ अपने लोगो को ख़बर दो वेह मुनाफिको के आग मे डाले जा रहे हैं, और मुनाफिको से भी कह दो की वह कैसी - कैसी साजिशें मुसलमानों के साथ कर रहे हैं? हज़रत अम्मार ने जब मुनाफिको से कहा तो वह भागे हुए आपकी सेवा मे हाज़िर हुए और इधर - उधर की बातें बनाने लगे ।

एक शख्स फहश बिन हिम्यार नामो मुनाफिको मे से बाद मे सच्चा मुसलमान हो गया और यम्मामा की लडाई मे शहीद हुआ अपनी मुनाफिकान रविश को छोड़ देने के बाद उसने बराबर अलह से दुआ की मुझ को ऐसी शहादत नसीब कर की न कोई गुस्ल दे सके और न की कफ़न - दफ़न कर सके । यम्मामा की लडाई मे ऐसा ही हुआ । तमाम शहीदों के शव तो मिल गए मगर इन साहब का शव का पता न चल सका । अल्लाह पाक ने उनकी दुआ कुबूल कर ली । दुबारा इस्लाम लाने के बाद उनका नाम बदल कर "अब्दुर रहमान" रखा गया था (इब्ने कसीर) शहादत वह दर्जा है के नेक बन्दे दुआए करते चले आयें हैं । हज़रत उमर राजिअल्लाहो यह दुआ किया करते थे , " ऐ अल्लाह ! दीन की राह पर मुझे शहादत नसीब कर और मुझे अपने रसूल के शहर मे मौत दे" । अल्लाह हर मुसलमान को यह नेक जज्बा अता फरमाए ---- आमीन

४२ . यह आयत अब्दुल्लाह बिन उबय्यी के बारे मे नाजिल हुई, जब उसने कहा की मोहम्मद की मिसाल उस कुत्ते की तरह है की किसी ने पाल कर खूब मोटा किया हो फिर वह अपने मालिक ही को काट खाए । बिकुल यही उदाहरण मोहम्मद और उनके सहाबा का जय की हमारे शहर मे आकर हम ही पर हुकूमत गाँठ रहे हैं, अब हम मदीना जा रहे हैं और उन ज़लीलो को निकाल कर ही दम लेंगे । इस खबीस की बकवास के बारे मे जब मोहम्मद को सूचन दी गई तो उसे बुलवाया लें वो मरदूद अपनी कही हुई बात से साफ़ मुकर गया और कसमे खा कर साफ़ बच निकला।
बुखारी शरीफ मे हैं की नबी करीम के मदीना शरीफ हिजरत करने से पहले लोगो ने इसी मुनाफिक को ताज पहना कर अपना पेशवा बनाना चाहा था, मगर आपके आने से इसकी कामना और इच्छा मिटटी मे मिल गई, इसी लिए वो दिल मे कीना रखने लगा था .



हदीस की डिटेल में बाद मे दूँगा अभी यही काफ़ी है अब ज़रा मुझे बताएं की कौन सी आयत मे काफिरों को न बख्शने को कहा गया है..........इन सब आयतों मे सिर्फ़ S. 4 : 89 को छोड़ कर कर बाकी सब आयतों मे क़यामत के दिन होने वाले आजाब का ज़िक्र है और वो उनके लिए जो इस्लाम कुबूल करने के बाद दुबारा काफिर हो गए...... इन सब आयतों मे से किसी मे भी यह नही है की तुम्हे जो काफिर मिले उसे मार दो ।
S . 4 : 89 मे उन मुनाफिको को मारने का हुक्म दिया है जो लोग ईमान लाने के बाद, इस्लाम कुबूल करने के बाद दोबार काफिर हो गए और मक्का - मदीना मे सबसे यह कहते फिर रहे थे की इस्लाम बहुत कमज़ोर और ख़राब मज़हब है हमने भी कुबूल किया लेकिन बदल गए इसीलिए तुम भी बदल जाओ और हमारे साथ आ जाओ ।
कुरआन की आयतें मौके की नजाकत के हिसाब से नाजिल हुईं है तो सिर्फ़ एक आयत से आप मतलब नही निकाल सकते हो इसलिए मैं आपको इन आयतों के साथ की जो आयतें है उनके तर्जुमे की ऑडियो भी दे रहा हूँ जिन्हें आप डाउनलोड करके सुन सकते हैं।


S. 2 : 19 - 30

S. 2 : 31 - 50

S. 3 : 81 - 92

S. 4 : 79 - 90

S.9 : 57 - 69


कुरआन अल्लाह का कलाम है उसमे ऐसी कोई बात नही है अगर आपको अब भी यकीन नही है तो और आयतें अपने ब्लॉग पर डाले मैं उनका जवाब दूँगा । लेकिन हैरत की बात है की कुरआन को पढने के बावजूद आपने ऐसी बात कैसे कही क्यूंकि जो एक बार कुरआन को धयान से पढ़ लेता वो कुबूल कर लेता है की कुरआन अल्लाह का कलाम है......... लगता है आप दुनिया के उन लोगो मे शामिल हो जिनके दिलो - दिमान पर टनों मिटटी पड़ी हुई है और जो कुरआन को समझने के लिहाज़ से नही बल्कि उसमे कमी निकलने के लिए पढ़ते हैं ।
एक बार अपना नजरिया बदलो, और इस्लाम और मुसलमानों के लिए जो तुम्हारे दिल मे गन्दगी है उसे साफ़ करो और फिर कुरआन को दिल से समझ कर पढो इंशाल्लाह मुझे यकीन है की आप उसे अल्लाह का कलाम कुबूल कर लोगे ।

शनिवार, 20 सितंबर 2008

इन्होने तो मुसलमानों को आतंकवादी और देशद्रोही साबित कर दिया !!

"अमिताभ बुधौलिया 'फरोग' जी" ने "भड़ास" और अपने ब्लॉग "गिद्ध" पर एक पोस्ट लिखी थी उसमे उन्होंने जो लिखा मैं उनकी भावनाओ की इज्ज़त करता हूँ लेकिन उन्होंने ना - ना करते करते आपने मुसलमानों को आतंकवादी और देशद्रोही साबित कर दिया, और बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद् की पुरी तरह से वकालत की है,
सिमी पर तो प्रतिबन्ध लगा हुआ है और सिमी ने जितने भी हमले किए उसमे से कोई भी हमला किसी धर्म विशेष पर नही था लेकिन बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद् ने सिर्फ़ एक धर्म के लोगो और उनके धर्म स्थलों को निशाना बनाया है तो उन्हें कैसे धर्म निरपेक्ष कह सकते हो? आप लोग ही बताये उन पर प्रतिबन्ध क्योँ नही लगाया जाए?
इस्लाम क्या किसी धर्म में यह नही बताया गया है की दूसरे धर्म के लोगो को जीने ना दो, उन्हें और उन्हें धर्म स्थलों को तबाह कर दो.... इस्लाम तो अपने मानने वालो को कुरान में आदेश देता है की "दुसरो के माबुदो (उपास्यो) को बुरा ना कहो (सूरा-ए-अलंफाल : आयत-१०८) |' पाक कुरान में खुदा का हुक्म है, "जिसने एक बेकुसूर का कत्ल किया, गोया उसने सारी इंसानियत का कत्ल कर दिया सूरा-ए-अल्मायेदाह : आयत - 108) |' आख़िर यह कौन से जेहादी हैं और इनका कौन सा मज़हब है, जो बेगुनाह लोगो की जान लेने को इन्हे आतुर करता है | दिल्ली बम काण्ड को ले, तो यह बात समझ नही आती की क्या कोई सच्चा मुस्लिम, और वे भी रमजान के पाक महीने में ऐसा जघन्य पाप करेगा | साफ़ है, आतंक्वादियौं का कोई धर्म और ईमान नही होता |
आज मुस्लिम समाज में कुछ लोग ऐसे हैं, जो इस्लाम की मानवतावादी शिक्षाओ से कोसो दूर हैं | ऐसे लोगो की गैर इस्लामी हरकतों से इस्लाम का नाम बदनाम होता होता है | इस्लाम का नाम बदनाम करने वाले आतंकवादी चाहे कश्मीर में हों, अफगानिस्तान में हों, पाकिस्तान में हों, अमेरिका में हों, या इंडोनेशिया में, ये सभी इंसानियत और मज़हब पर बदनुमा दाग हैं | इस्लाम अपने मानने वालो को ये आदेश भी देता है की बुढो, बच्चो और औरतों पर हथियार न उठाओ, किसी भी धर्मस्थल में बैठे हुए राहिबो व सन्यासियों पर हमला न करो | किसी ऐसे आदमी पर हमला न करो और ऐसे आदमी से न लड़ो, जो मुकाबला करने की हालत में न हो | मगर आतंकियों ने कभी इन नसीहतो को नही पढ़ा | सिर्फ़ नाम मुसलमान का और बाप - दादा के मुसलमान होने कोई मुसलमान नही हो जाता हैं,

इस्लाम एक आधुनिक धर्म है और धर्म से अधिक जीवन व्यतीत करने की कला है | इसीलिए एक आम मुस्लिम इन आतंकी हमलो की कभी हिमायत नही करता, मगर यह कुबूलने में कोई गुरेज़ नही की लगातार हो रहे आतंकी विस्फोटो के पीछे के तथाकथीत अक्स ने एक समूचे समुदाय के ऐतबार को चोट पहुचाई है |

इस्लाम को इन जेहादियों ने एक हिंसक रूप में पेश किया है, जबकि इसका नाता तो सूफी फलसफे से जुड़ा है और यह तलवार से नही, बल्कि सुफियान सोच और मोहब्बत से दुनिया भर में फैला है | पाक कुरान में तीसवें पारे (अध्याय) की सुरा-ए-अल्काफिरून में लिखा है, 'लकुम दिनोकुम वली यदिन' अर्थार्त तुम्हे तुम्हारा धर्म मुबारक, हमें हमारा धर्म मुबारक | कुरान में कहीं नही लिखा की दकाज़नी करो, खूरेंजी करो या दूसरो की जान लो | सच्चाई तो यह है की रहमदिली को इस्लाम का जौहर माना गया है |
कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं की क्या कुरान के यह संदेश ओसामा बिन लादेन, मुल्ला उमर, मसूद अजहर आदि ने नही पढ़े होंगे? इसके जवाब में यह प्रश्न पुछा जा सकता है की क्या इस्लाम के असली ठेकेदार और मुल्ला यही लोग हैं? एक कहावत है, नीम हकीम खतरा ऐ जान और नीम मुल्ला खतरा ऐ ईमान | जेहाद का नाम लेकर बेगुनाह लोगो की हत्या कर रहे लोग शायद ये नही जानते की जेहाद का अर्थ हज़रात मोहम्मद ने अपने नफ्स (इन्द्रियों) से लड़ना बताया है |

मंगलवार, 8 जुलाई 2008

इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बहुत ग़लतफ़हमियाँ है....

सबसे पहले आप सभी भाई बंधुओ का तहेदिल से शुक्रिया जिन्होंने मेरी पोस्ट को पढ़ कर अपने विचार प्रकट किए । मैं आप लोगो के विचारों की इज्ज़त करता हूँ ।

मैं आपके सब सवालों का जवाब दूंगा तो सबसे पहले रोहित त्रिपाठी जी के सवाल का जवाब दूंगा उन्होंने पुछा है की जितने आतंकवादी पकड़े गए वो सब मुसलमान क्योँ है?

पहली बात क्या आपको यकीन है की जो लोग पकड़े गए वो असलियत में आतंकवादी थे या बेकुसूर थे? आपने उनके कुसूरवार होने का फ़ैसला कैसे कर दिया? चलिए मैं मानता हूँ की सब गुनाहगार थे तो उन्होंने जो हमले किए उन हमलो में मरने और घायल होने वाले सब लोग हिंदू थे? उसमे कोई मुसलमान नही था? या जिन लोगो का नुक्सान हुआ था उसमे से कोई मुसलमान नही था? और अगर नही था तब भी मैं पूछता हूँ उसमे सारी दुनिया के मुसलमानों का क्या कसूर?
अगर एक घर के पाँच बेटो में एक बेटा गुंडा बन जाए और बाकी सब डॉक्टर, साइंटिस्ट, वगेरह हो तो क्या उस गुंडे के कर्मो की सज़ा कानून सारे बेटो को देगा? नही जिसने जो कर्म किए उसकी सज़ा सिर्फ़ उसे ही मिलनी चाहिए । आतंक्वादियौं का कोई धर्म - ईमान नही होता है ।

संजय शर्मा जी गुप्ता जी और मेरी बात में एक फर्क है जिस वजह से मुझे लिखना पड़ा वो बात थी की उन्होंने सिर्फ़ हिंदू धर्म की बात की थी बाकी और धर्मो की नही मैंने तो बस उनकी बात को थोड़ा सा सही किया है और कुछ उन्होंने कहा की हिंदू धर्म में किसी से नफरत करना नही सिखाया जाता है तो मैंने बता दिया की दुनिया के किसी धर्म में यह नही सिखाया जाता है.....रही बात काफिर के साथ क्या करना चाहिए तो कुरान में है की काफिर को इस्लाम की दावत दो लेकिन सिर्फ़ ज़बान से....उसके साथ कोई ज़बरदस्ती नही करना और ना ही उसको इस्लाम कुबूल करने के लिए मजबूर कीजिये।

राज भाटिया जी आप मेरे बड़े है मैं आपकी बात की इज्ज़त करता हूँ लेकिन मैं आपको बात को सही करना चाहूँगा की काफिर का मतलब नास्तिक नही होता है क्यूंकि नास्तिक किसी भगवान् में यकीन नही करता है। और काफिर का मतलब होता है इनकारी.....जिसने अल्लाह के हुक्म से इनकार किया, मोहम्मद साहब को अल्लाह का संदेशवाहक नही माना, उनकी बात पर यकीन नही किया, उसे काफिर कहते है

सुनील डोगरा जालिम जी मैंने उनकी उम्र पर कोई टिप्पणी नही की थी दरअसल मैंने उनकी उम्र इसलिए बताई थी क्यूंकि इतनी दुनिया देखने के बावजूद उन्होंने इस तरह की टिप्पणी की ।

ab inconvenienti जी यहूदियों ने अल्लाह के संदेशवाहक हजरत उजैर को खुदा का बेटा करार दे दिया इसलिए उनको काफिर कहा जाता है और अल्लाह की कोई औलाद नही है । काफिर के प्रति सच्चे मुसलमान के कर्तव्य यह है की वो उसको इस्लाम की दावत दे मगर सिर्फ़ जुबां से, उसे इस्लाम की खुबियौं के बारे में बताये, उससे नफरत ना करे, उसे किसी भी तरह का नुक्सान पहुचाने की कोशिश भी ना करे, उसके साथ किसी भी तरह की ज़ोर- ज़बरदस्ती ना करे, ना उसको इस्लाम कुबूल करने को मजबूर करे .

अगर किसी भाई के मन में कोई सवाल हो तो वो बेझिझक पूछ सकता है...
तो मेरी आप सब लोगो से गुजारिश है की हिंदू - मुस्लिम के झगडे से दूर रहे और सगे भाइयो की तरह रहे और हाथ से हाथ मिला कर हिन्दुस्तान को नई ऊंचाई पर ले जाए..... जय हिंद
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