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शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

दहशतगर्द कौन और गिरफ्तारियां किन की, अब तो सोचो......! अज़ीज़ बर्नी Rss, Terrisiom, Jihad, Aziz Burney

पेश-ए-खिदमत है रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा के सम्पादक अज़ीज़ बर्नी जी का लेख......

 रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा केवल एक समाचारपत्र नहीं, बल्कि इस युग का इतिहास लिखने जा रहा है। हमने तो यह उसी समय तय कर लिया था, जब इस मिशन का आरंभ किया था, लेकिन प्रसन्नता तथा संतोष की बात यह है कि आज हमारे पाठक भी इस सच्चाई को महसूस करने लगे है और उनकी दुआयें हर क्षण हमारे साथ रहती हैं, हम जानते और मानते हैं कि यह उन्ही की दुआओं, प्रोत्साहन की ताकत है कि हम लगातार इस दिशा में आगे बढ़ते जा रहे हैं और निस्तर तथ्य सामने आते चले जा रहे हैं। साथ ही एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही जा सकती है कि पूर्ण रूप से न सही, परन्तु एक हद तक तो हम उस निराशाजनक दौर से निकल आयें हैं, जब सरकारों से यह आशा ही नहीं की जा सकती थी कि उनकी जांच का रूख मुसलमानों से हटकर किसी और दिशा में भी आगे बढ़ सकता है। अगर आरंभ में ही यह कदम उठा लिये जाते तो देश को जिन आतंकवादी हमलों का सामना करना पड़ा, शायद उनसे बच जाते। बहरहाल आज के इस संक्षिप्त लेख में मैं अपने पाठकों तथा भारत सरकार के सामने थोड़े शब्दों में वे घटनायें सामने रखना चाहता हूं , जिन से बार-बार हमारे देश को जूझना पड़ा। अभी चर्चा केवल उनकी जिनकी जांच का निष्कर्ष सामने आ गया है या आता जा रहा है। हो सकता है शेष घटनाओं की भी नये सिरे से छान बीन हो तो ऐसा ही कुछ सामने आये। यह कुछ मिसाले इसलिए कि हमारी सरकारी और खुफिया एजेंसियां अंदाजा कर सकें कि हमने उन बम धमाकों के बाद किन लोगों को संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया था और जब सच सामने आया तो किनके चेहरे सामने आये।

मालेगांव धमाके 

मंगलवार, 10 मार्च 2009

शंकराचार्य का बयान इस्लाम के सम्बन्ध मे !!!!

दोस्तों, पिछली पोस्ट मे मैंने आपको एक शख्स के बारे मे बताया था, जिसकी सोच मुसलमानों और इस्लाम के बारे मे कितनी ग़लत थी, अब मैं आप लोगो के सामने एक विडियो पेश कर रहा हूँ इसमे एक शंकराचार्ये एक सभा को



संबोदित कर रहे हैं, अब आप लोग इनके विचार सुनिए, इस्लाम और मुसलमानों के बारे मे ! कृपया इस विडियो को देखने के बाद अपनी बहुमूल्य टिप्पणी ज़रूर दीजियेगा, धन्यवाद.

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

साठ साल से मुसलमान हमें "कैंसर" दे रहे हैं?...!!!!!

पिछले साठ साल से मुसलमान हमें कैंसर दे रहे हैं....उसका क्या करें? यह अल्फाज़ एक ७५ वर्षीय व्यक्ति के हैं जो उसने मुझसे कहे थे, यह बात तब की हैं जब मैं हमेशा की तरह अपने काम के सिलसिले मे टूर पर गया हुआ था मेरा बुधवार को कानपूर स्टेशन से टूंडला तक संगम एक्सप्रेस मे रिज़र्वेशन था, मेरे साथ मेरे पिताजी थे....गाड़ी एक घंटा लेट थी, दस बजकर बीस मिनट पर गाड़ी आई, हमारी बर्थ एस २ मे ५१, ५२ थी, जब हम बोगी मे पहुचे तो देखा उसमे ७२ नही ८४ बात थी, तो लाज़मी था सबके बर्थ नम्बर बदलने थे क्यूंकि टिकट पर नम्बर ७२ के हिसाब से लिखे थे.....मैं बाहर गया तो रिज़र्वेशन चार्ट फटे हुए थे हमेशा की तरह, तो मैंने वहां लगी टच स्क्रीन कंप्यूटर से अपना बर्थ नम्बर निकाल लिया जो की ५७, ५८ था, अब अपनी बर्थ पर saaman रख कर मैं बाथरूम गया, वहां से आने के बाद मैंने देखा की मेरी बर्थ की सामने वाली साइड बर्थ पर एक बुजुर्ग आदमी जिनकी उम्र लगभग ७५ से ७८ साल होगी, गोरा रंग, एकहरा बदन, वो बर्थ पर लेटे हुए बीढ़ी पी रहे थे, मुझे बीढ़ी - सिगरेट के धुंए से घुटन होती है, मैंने उनसे कहा अंकल जी, आप बीढ़ी बुझा दो या फिर दरवाज़े पर खड़े हो कर पी लीजिये, तो उन्होंने कहा की मैं दो कश लेकर बुझा रहा हूँ। उन्होंने दो कश लिए लेकिन उन दो कश मे पुरी बीढ़ी ख़तम कर दी, मैंने उनसे कहा "अंकल, क्योँ आप अपने अंदर बरसो से पल रही बीमारी को लोगो दे रहे हो," तो उन्होंने कहा की "तुम लोग हमें साठ साल से जो बीमारी दे रहे हो उसका क्या?" मेरी समझ मे कुछ नही आया, मैंने उनसे दोबारा पूछा "कौन सी बीमारी, कौन लोग दे रहे हैं?" तो उन्होंने कहा की "तुम, तुम मुसलमान हमें साठ साल से कैंसर दे रहे हो, उसका हम क्या करें?" यह सुनने के बाद मैं दो - तीन मिनट तक कुछ बोल नही सका, मैंने सुना था की कई बार मुसलमानों से कुछ लोग ऐसा सौतेला व्यवहार कर जाते हैं, लेकिन उन लोगो की बातों को मैंने कभी सीरियसली नही लिया लेकिन उनके मुहँ से यह सुनने बाद मुझे उन लोगो की बातों पर यकीन हो गया, मैं समझता था की ऐसी बातें सिर्फ़ सियासत से जुड़े लोग ही करते हैं, आम आदमी कभी नही करता लेकिन उन्होंने मेरी समझ को झूठा साबित कर दिया।
इतने मे मेरी पिताजी जो बाथरूम गए हुए थे वो वापस आ गए, उनके इतना कहने के बाद वहां पर जो लोग भी मौजूद थे उन सबने उन अंकल से बोला की क्या बेकार की बात कर रहे हो? इसमे हिंदू - मुस्लिम की बात कहाँ से आ गई? उस बच्चे ने सिर्फ़ इतना ही कहा था की बीढ़ी बुझा दो, ग़लत तो नही कहा था, तुम ट्रेन मे बीढ़ी पी रहे जो की कानूनन जुर्म है....पिताजी ने जब हंगामा होते देखा तो उन्होंने पूछा की क्या हुआ? मैंने उन्हें थोडी बहुत बात बता दी लेकिन मैंने उन्हें यह नही बताया की उन्होंने मुझसे क्या कहा था, उसके बाद भी वो पिताजी से लड़ने लगे, वो तो मारपीट करने की लिए अपनी बर्थ से उतर कर आ गए थे, लेकिन वहां मौजूद लोगो ने बीच बचाव करा दिया, बात खतम हो गई, लेकिन यह बात मेरे लिए ख़तम नही हुई थी मैं पुरी रात अपनी बर्थ पर लेटा सोचता रहा, नींद मेरी आंखों से कोसो दूर रह - रह कर कानो मे वो आवाज़ गूंज रही थी, उनकी आवाज़ मे जो कड़वाहट थी वो भुलाए नही भूलती है, उनकी आंखों मे मुझे बहुत नफरत दिखाई दी थी, मुसलमानों के लिए......

पुरी रात सोचते - सोचते निकल गई, मेरे दिल मे बहुत सारे सवाल आ रहे है, जिनके जवाब तलाशने हैं:-

क्या मुसलमान भारतवासी नही है?

क्या मुसलमानों को हिन्दुस्तान मे रहने का हक़ नही हैं?

क्या हिन्दुस्तान मुसलमानों का मुल्क नही है?

क्या यह देश सिर्फ़ हिन्दुओं का है?

क्या जो लोग आज़ादी से पहले से यहाँ रहते आ रहे हैं, और जिनके पुरखो ने आज़ादी की ज़ंग मे हिस्सा लिया वो यहाँ रहने के लायक नही हैं?

क्या कुछ मुसलमानों का अपने लिए अलग ज़मीन माँगना, सारे मुसलमानों के लिए इतना भारी पड़ेगा की उनके
मुल्क मे उन्हें पराया माना जाए?

क्या कुछ लोगो की ग़लत हरकतों की सज़ा पुरी कौम्म को देना सही है?

क्या आपको पता है जब किसी आदमी को लोग शक की नजरो से देखते है कितनी तकलीफ होती है?

क्या आपको पता है जब स्टेशन पर पुलिस वाला सब को छोड़ कर आपसे पूछताछ करता है तो कैसा लगता है?

तब आपको कैसा लगेगा जब कमरा किराये पर देने से पहले आपका धर्म पुछा जाता है?

क्या कभी किसी आम मुसलमान की ज़िन्दगी को आपने गौर से देखा है? कभी देखियेगा, वो सुबह उठेगा, नमाज़ पड़ेगा, और रोजाना के काम करने के बाद अपने काम पर निकल जाएगा, शाम को फिर वापस घर। एक आम हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिख या किसी धर्म या जाती का हो, इन सब आम आदमियों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मे सिर्फ़ एक फर्क हैं वो हैं अपने इश्वर को याद करने का तरीका, उसकी पूजा करने का तरीका, बस इसके अलावा सब कुछ एक सा है।

मेरी बात को ज़रा अकेले मे बैठ कर sochiयेगा, क्या यह जो हम लोग एक धर्म के लोगो के साथ कर रहे हैं, क्या वो सही है?

रविवार, 3 अगस्त 2008

हर मुसलमान आतंकवादी नही है......

मैंने आज मोहल्ला पर अविनाश जी ने फरीद भाई की पोस्ट के बारे में लिखा है वो बहुत सही लिखा है....हमारे देश में बिल्कुल यही हो रहा है हम लोग आज कल बिलकूल यही कर रहे है......हर मुसलमान को गुनाहगार की तरह देख रहे हैं समझते है की यह भी एक आतंकवादी है......
मैं मानता हूँ की आज तक जितने आतंकवादी पकड़े गए है सब मुसलमान थे लेकिन कभी हमने या किसी भी हिन्दुस्तानी ने यह जानने की कोशिश की है वो वाकई में आतंकवादी था जिस आदमी को पुलिस ने पकड़ कर हमारे सामने पेश किया है वो वाकई में आतंकवादी है या सिर्फ़एक आम आदमी....हमारी पुलिस जिसको सामने खडा कर देती है वो ही मुजरिम हो जाता है चाहे उसको खिलाफ साबुत हो या नही इससे कोई मतलब नही है....किसी भी हिन्दुस्तानी ने उस इंसान का इतिहास जानने की कोशिश की पकडे जाने से पहले वो कया करता था???? नही किसी ने नही की

बंगलोर में 8 बम फटे , १ मौत हुई, ९ घायल हुए,
अहमदाबाद में १९ बम पते, ५४ मौते हुई, ११४ घायल हुए,
सूरत में २० बम बरामद हुए जिसमे से एक भी नही फटा...

बंगलोर और अहेम्दाबाद में कम क्षमता वाले धमाके किए गए.....लेकिन आतंकवादीयो ने ऐसा क्योँ किया यह समझ से बहार है क्यूंकि आतंकवादियों का मकसद तो आतंक फेलाना है जितने ज़यादा लोग मरेंगे उतना आतंक फैलेगा तो उनके दिल में दया कैसे आ गई जो उन्होंने कम ताकत के बम इस्तेमाल करे ??/

यह सब सत्ता की राजनीति है और कुछ नही सत्ता के ठेकेदारों ने हमें अपने हात की कटपुतली बना रखा है और हमें अपने हिसाब से इस्तेमाल करते आ रहे है....

अब वक्त आ गया है की हम लोग हिंदू-मुस्लिम से आगे बढ़ कर सोचे, एक होकर इससे लादे तो उसी में ही हमारी भलाई है....इस हालात पर एक शेर याद आ रहा जो काफी वक्त पहले सुना था....

अभी भी वक्त है जाग जाओ ऐ हिन्दुस्तान वालो
वरना मीट जाओगे तुम्हारी दास्तां भी न होगी, दास्तानों में

मंगलवार, 8 जुलाई 2008

इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बहुत ग़लतफ़हमियाँ है....

सबसे पहले आप सभी भाई बंधुओ का तहेदिल से शुक्रिया जिन्होंने मेरी पोस्ट को पढ़ कर अपने विचार प्रकट किए । मैं आप लोगो के विचारों की इज्ज़त करता हूँ ।

मैं आपके सब सवालों का जवाब दूंगा तो सबसे पहले रोहित त्रिपाठी जी के सवाल का जवाब दूंगा उन्होंने पुछा है की जितने आतंकवादी पकड़े गए वो सब मुसलमान क्योँ है?

पहली बात क्या आपको यकीन है की जो लोग पकड़े गए वो असलियत में आतंकवादी थे या बेकुसूर थे? आपने उनके कुसूरवार होने का फ़ैसला कैसे कर दिया? चलिए मैं मानता हूँ की सब गुनाहगार थे तो उन्होंने जो हमले किए उन हमलो में मरने और घायल होने वाले सब लोग हिंदू थे? उसमे कोई मुसलमान नही था? या जिन लोगो का नुक्सान हुआ था उसमे से कोई मुसलमान नही था? और अगर नही था तब भी मैं पूछता हूँ उसमे सारी दुनिया के मुसलमानों का क्या कसूर?
अगर एक घर के पाँच बेटो में एक बेटा गुंडा बन जाए और बाकी सब डॉक्टर, साइंटिस्ट, वगेरह हो तो क्या उस गुंडे के कर्मो की सज़ा कानून सारे बेटो को देगा? नही जिसने जो कर्म किए उसकी सज़ा सिर्फ़ उसे ही मिलनी चाहिए । आतंक्वादियौं का कोई धर्म - ईमान नही होता है ।

संजय शर्मा जी गुप्ता जी और मेरी बात में एक फर्क है जिस वजह से मुझे लिखना पड़ा वो बात थी की उन्होंने सिर्फ़ हिंदू धर्म की बात की थी बाकी और धर्मो की नही मैंने तो बस उनकी बात को थोड़ा सा सही किया है और कुछ उन्होंने कहा की हिंदू धर्म में किसी से नफरत करना नही सिखाया जाता है तो मैंने बता दिया की दुनिया के किसी धर्म में यह नही सिखाया जाता है.....रही बात काफिर के साथ क्या करना चाहिए तो कुरान में है की काफिर को इस्लाम की दावत दो लेकिन सिर्फ़ ज़बान से....उसके साथ कोई ज़बरदस्ती नही करना और ना ही उसको इस्लाम कुबूल करने के लिए मजबूर कीजिये।

राज भाटिया जी आप मेरे बड़े है मैं आपकी बात की इज्ज़त करता हूँ लेकिन मैं आपको बात को सही करना चाहूँगा की काफिर का मतलब नास्तिक नही होता है क्यूंकि नास्तिक किसी भगवान् में यकीन नही करता है। और काफिर का मतलब होता है इनकारी.....जिसने अल्लाह के हुक्म से इनकार किया, मोहम्मद साहब को अल्लाह का संदेशवाहक नही माना, उनकी बात पर यकीन नही किया, उसे काफिर कहते है

सुनील डोगरा जालिम जी मैंने उनकी उम्र पर कोई टिप्पणी नही की थी दरअसल मैंने उनकी उम्र इसलिए बताई थी क्यूंकि इतनी दुनिया देखने के बावजूद उन्होंने इस तरह की टिप्पणी की ।

ab inconvenienti जी यहूदियों ने अल्लाह के संदेशवाहक हजरत उजैर को खुदा का बेटा करार दे दिया इसलिए उनको काफिर कहा जाता है और अल्लाह की कोई औलाद नही है । काफिर के प्रति सच्चे मुसलमान के कर्तव्य यह है की वो उसको इस्लाम की दावत दे मगर सिर्फ़ जुबां से, उसे इस्लाम की खुबियौं के बारे में बताये, उससे नफरत ना करे, उसे किसी भी तरह का नुक्सान पहुचाने की कोशिश भी ना करे, उसके साथ किसी भी तरह की ज़ोर- ज़बरदस्ती ना करे, ना उसको इस्लाम कुबूल करने को मजबूर करे .

अगर किसी भाई के मन में कोई सवाल हो तो वो बेझिझक पूछ सकता है...
तो मेरी आप सब लोगो से गुजारिश है की हिंदू - मुस्लिम के झगडे से दूर रहे और सगे भाइयो की तरह रहे और हाथ से हाथ मिला कर हिन्दुस्तान को नई ऊंचाई पर ले जाए..... जय हिंद
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