नामक वेबसाइट का ज़िक्र किया है इस वेबसाइट पर कुछ जुते बिक रहे है इन जुतों पर गणेश जी,कृष्ण,ॐ,बुद्ध,मदर टेरेसा के चित्र, और अल्लाह लिखा हुआ है। उन तस्वीरों में से कुछ यहां पर देखिये
धर्म, जात - पात को एक तरफ़ रख कर हिन्दुस्तान को एक सूत्र के पिरोने की कोशिश....
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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
सारे भारतवासियों से अपील अपना विरोध दर्ज करायें... जुते पर गणेश, कृष्ण, बोद्ध के चित्र और अल्लाह, लिखा है.. One Appeal To All Indian Register Your Complain.. Photos Of Ganesh, Buddh, Krishana And Allah Written On Shoes
आज से दो दिन पहले बेरोज़गार ने एक लेख लिखा था जूते पर गणेश जी,कृष्ण,ॐ,बुद्ध,मदर टेरेसा के चित्र !! कोई इस्लामिक चिह्न क्यों नहीं? फ़िर उन्होने एक लेख और लिखा मैं ग़लत था, इस वेबसाईट पर इस्लामिक प्रतीक भी हैं। अब तो हिंदू मुस्लिम एक हो जाओ !!! इन दोनों लेखों मे उन्होने एक ZAZZLE
नामक वेबसाइट का ज़िक्र किया है इस वेबसाइट पर कुछ जुते बिक रहे है इन जुतों पर गणेश जी,कृष्ण,ॐ,बुद्ध,मदर टेरेसा के चित्र, और अल्लाह लिखा हुआ है। उन तस्वीरों में से कुछ यहां पर देखिये
नामक वेबसाइट का ज़िक्र किया है इस वेबसाइट पर कुछ जुते बिक रहे है इन जुतों पर गणेश जी,कृष्ण,ॐ,बुद्ध,मदर टेरेसा के चित्र, और अल्लाह लिखा हुआ है। उन तस्वीरों में से कुछ यहां पर देखिये
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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009
नवरात्रों में देवी के भेंट चढें मेरे साथ २००-२५० लैंडलाईन कनेक्शन... 200-250 Landline Connection Was Destroyed On Navratra
(वैधानिक चेतावनी :- ये लेख मैं लिखता नही लेकिन सुरेश चिपलूनकर जी के एक लेख के वजह से मुझे ये लिखना पड रहा है। ये लेख कोई साम्प्रदायिक्ता बढाने वाला लेख नही है. मैं इस लेख के माध्यम से लोगों के दिमाग पर पडी मिट्टी हटाना चाहता हूं )
इस साल १९ सितम्बर से नवरात्रे शुरु हुऐ थे.....२१ सितम्बर हो ईद थी। मैं आगरा के नाई की मण्डी श्रेत्र में रहता हूं और नाई की मण्डी में बी.एस.एन.एल की फ़ोन लाईन आगरा फ़ोर्ट और बिजलीघर की तरफ़ से आती है। ये लाईन बिजलीघर से चल कर मंटोला होती हुई सदर भट्टी होती हुई सीधे नालबंद चौराहे को निकल जाती है।
हर साल तीसरे या चौथे नवरात्रे को सदरभटटी चौराहे के पास खोजा हवेली पर पंडाल लगाकर पुरा रास्ता बंद कर दिया जाता है और वहां देवी की पुजा की जाती है और आजतक किसी ने इस पर ऐतराज़ नही किया हालंकि इससे जुता कारीगरों और व्यापारियों को परेशानी होती उनको बहुत घुम कर हींग की मण्डी जाना पडता है लेकिन ये बात सिर्फ़ एक-दो दिन की होती है इसलिये कोई कुछ नही कहता है।
इस साल १९ सितम्बर से नवरात्रे शुरु हुऐ थे.....२१ सितम्बर हो ईद थी। मैं आगरा के नाई की मण्डी श्रेत्र में रहता हूं और नाई की मण्डी में बी.एस.एन.एल की फ़ोन लाईन आगरा फ़ोर्ट और बिजलीघर की तरफ़ से आती है। ये लाईन बिजलीघर से चल कर मंटोला होती हुई सदर भट्टी होती हुई सीधे नालबंद चौराहे को निकल जाती है।
हर साल तीसरे या चौथे नवरात्रे को सदरभटटी चौराहे के पास खोजा हवेली पर पंडाल लगाकर पुरा रास्ता बंद कर दिया जाता है और वहां देवी की पुजा की जाती है और आजतक किसी ने इस पर ऐतराज़ नही किया हालंकि इससे जुता कारीगरों और व्यापारियों को परेशानी होती उनको बहुत घुम कर हींग की मण्डी जाना पडता है लेकिन ये बात सिर्फ़ एक-दो दिन की होती है इसलिये कोई कुछ नही कहता है।
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सोमवार, 10 अगस्त 2009
दुसरों को गरियाओं और मशहुर हो जाओं...!!! Abuse Other's And Get Famous...!!!
(वैधानिक चेतावनी – इन दोनों उदाहरणों में पात्र व घटनायें वास्तविक हैं, इनका जीवित व्यक्तियों से सम्बन्ध है, हिन्दी ब्लॉग जगत से तो बिलकुल है…)
दुसरों को गरियाओं और मशहुर हो जाओं..!!! आज के दौर का सबसे ज़्यादा पसंद किया जाने वाला तरीका....या ये कहें की हर दौर का मशहुर होने का सबसे आसान तरीका.....
विवादित बयान से पहले किसी को वरूण गांधी का नाम मालुम था??
विवादित टिप्पणी से पहले कोई रीता बहुगुंणा को जानता था????...... इस बात पर एक शायर की कही एक लाईन याद आ रही है...
दुसरों को गरियाओं और मशहुर हो जाओं..!!! आज के दौर का सबसे ज़्यादा पसंद किया जाने वाला तरीका....या ये कहें की हर दौर का मशहुर होने का सबसे आसान तरीका.....
विवादित बयान से पहले किसी को वरूण गांधी का नाम मालुम था??
विवादित टिप्पणी से पहले कोई रीता बहुगुंणा को जानता था????...... इस बात पर एक शायर की कही एक लाईन याद आ रही है...
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शनिवार, 8 अगस्त 2009
अल्लाह, इस्लाम, कुरआन और मुसलमानों को गरियातें हिन्दी ब्लोग्गर...!!! Hindi Blogger's Abusing Allah, Islam, Qur-an And Muslim's
पिछ्ले ७-८ दिन से स्वच्छ सन्देश: हिन्दुस्तान की आवाज पर कुछ धर्मों के मुताल्लिक बह्स हो रही है जिसमें ये प्रथा होनी चाहिये या नही, वो होनी चाहिये या नही। मैं भी इस बहस में शामिल था क्यौंकि थोडी बहुत जानकारी इस नाचीज़ को भी है। बह्स सही चल रही थी लेकिन अचानक एक हिन्दी ब्लोग्गर ने अभ्रद भाषा का इस्तेमाल शुरु कर दिया और उसकी देखा देखी और लोग भी शुरु हो गये।
ये लोग कुरआन को बकवास करार दे रहे है, मुह्म्मद साहब को सबसे बडा गुनहगार बता रहे है और भी बहुत कुछ कहा है उन लोगो ने...जिससे मुझे बहुत तकलीफ़ पहुंची है.......
ये लोग कुरआन को बकवास करार दे रहे है, मुह्म्मद साहब को सबसे बडा गुनहगार बता रहे है और भी बहुत कुछ कहा है उन लोगो ने...जिससे मुझे बहुत तकलीफ़ पहुंची है.......
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शनिवार, 11 जुलाई 2009
दहश्तगर्दों के खिलाफ़ फ़तवा आखिर कब?
काफ़ी वक्त से ये सवाल हिन्दुस्तान की अवाम के दिमाग मे घुम रहा है की आखिर कब दहश्तगर्दों के खिलाफ़ फ़तवा जारी होगा। ११ सितम्बर के हादसे के बाद से पुरी दुनिया मे मुसलमानों के लिये हालात दिन ब दिन खराब होते जा रहे हैं।
इस्लाम क्या किसी धर्म में यह नही बताया गया है की दूसरे धर्म के लोगो को जीने ना दो, उन्हें और उन्हें धर्म स्थलों को तबाह कर दो.... इस्लाम तो अपने मानने वालो को कुरआन में आदेश देता है की "दुसरो के माबुदो (उपास्यो) को बुरा ना कहो (सूरा-ए-अलंफाल सुरह. ८ : आयत-१०८) |' पाक कुरआन में खुदा का हुक्म है, "जिसने एक बेकुसूर का कत्ल किया, गोया उसने सारी इंसानियत का कत्ल कर दिया" (सूरा-ए-अल्मायेदाह सुरह. ५ : आयत - 108) |' आख़िर यह कौन से जेहादी हैं और इनका कौन सा मज़हब है, जो बेगुनाह लोगो की जान लेने को इन्हे आतुर करता है | दिल्ली बम काण्ड को ले, तो यह बात समझ नही आती की क्या कोई सच्चा मुस्लिम, और वे भी रमजान के पाक महीने में ऐसा जघन्य पाप करेगा | साफ़ है, आतंक्वादियौं का कोई धर्म और ईमान नही होता |
इस्लाम क्या किसी धर्म में यह नही बताया गया है की दूसरे धर्म के लोगो को जीने ना दो, उन्हें और उन्हें धर्म स्थलों को तबाह कर दो.... इस्लाम तो अपने मानने वालो को कुरआन में आदेश देता है की "दुसरो के माबुदो (उपास्यो) को बुरा ना कहो (सूरा-ए-अलंफाल सुरह. ८ : आयत-१०८) |' पाक कुरआन में खुदा का हुक्म है, "जिसने एक बेकुसूर का कत्ल किया, गोया उसने सारी इंसानियत का कत्ल कर दिया" (सूरा-ए-अल्मायेदाह सुरह. ५ : आयत - 108) |' आख़िर यह कौन से जेहादी हैं और इनका कौन सा मज़हब है, जो बेगुनाह लोगो की जान लेने को इन्हे आतुर करता है | दिल्ली बम काण्ड को ले, तो यह बात समझ नही आती की क्या कोई सच्चा मुस्लिम, और वे भी रमजान के पाक महीने में ऐसा जघन्य पाप करेगा | साफ़ है, आतंक्वादियौं का कोई धर्म और ईमान नही होता |
शुक्रवार, 6 मार्च 2009
साठ साल से मुसलमान हमें "कैंसर" दे रहे हैं?...!!!!!
पिछले साठ साल से मुसलमान हमें कैंसर दे रहे हैं....उसका क्या करें? यह अल्फाज़ एक ७५ वर्षीय व्यक्ति के हैं जो उसने मुझसे कहे थे, यह बात तब की हैं जब मैं हमेशा की तरह अपने काम के सिलसिले मे टूर पर गया हुआ था मेरा बुधवार को कानपूर स्टेशन से टूंडला तक संगम एक्सप्रेस मे रिज़र्वेशन था, मेरे साथ मेरे पिताजी थे....गाड़ी एक घंटा लेट थी, दस बजकर बीस मिनट पर गाड़ी आई, हमारी बर्थ एस २ मे ५१, ५२ थी, जब हम बोगी मे पहुचे तो देखा उसमे ७२ नही ८४ बात थी, तो लाज़मी था सबके बर्थ नम्बर बदलने थे क्यूंकि टिकट पर नम्बर ७२ के हिसाब से लिखे थे.....मैं बाहर गया तो रिज़र्वेशन चार्ट फटे हुए थे हमेशा की तरह, तो मैंने वहां लगी टच स्क्रीन कंप्यूटर से अपना बर्थ नम्बर निकाल लिया जो की ५७, ५८ था, अब अपनी बर्थ पर saaman रख कर मैं बाथरूम गया, वहां से आने के बाद मैंने देखा की मेरी बर्थ की सामने वाली साइड बर्थ पर एक बुजुर्ग आदमी जिनकी उम्र लगभग ७५ से ७८ साल होगी, गोरा रंग, एकहरा बदन, वो बर्थ पर लेटे हुए बीढ़ी पी रहे थे, मुझे बीढ़ी - सिगरेट के धुंए से घुटन होती है, मैंने उनसे कहा अंकल जी, आप बीढ़ी बुझा दो या फिर दरवाज़े पर खड़े हो कर पी लीजिये, तो उन्होंने कहा की मैं दो कश लेकर बुझा रहा हूँ। उन्होंने दो कश लिए लेकिन उन दो कश मे पुरी बीढ़ी ख़तम कर दी, मैंने उनसे कहा "अंकल, क्योँ आप अपने अंदर बरसो से पल रही बीमारी को लोगो दे रहे हो," तो उन्होंने कहा की "तुम लोग हमें साठ साल से जो बीमारी दे रहे हो उसका क्या?" मेरी समझ मे कुछ नही आया, मैंने उनसे दोबारा पूछा "कौन सी बीमारी, कौन लोग दे रहे हैं?" तो उन्होंने कहा की "तुम, तुम मुसलमान हमें साठ साल से कैंसर दे रहे हो, उसका हम क्या करें?" यह सुनने के बाद मैं दो - तीन मिनट तक कुछ बोल नही सका, मैंने सुना था की कई बार मुसलमानों से कुछ लोग ऐसा सौतेला व्यवहार कर जाते हैं, लेकिन उन लोगो की बातों को मैंने कभी सीरियसली नही लिया लेकिन उनके मुहँ से यह सुनने बाद मुझे उन लोगो की बातों पर यकीन हो गया, मैं समझता था की ऐसी बातें सिर्फ़ सियासत से जुड़े लोग ही करते हैं, आम आदमी कभी नही करता लेकिन उन्होंने मेरी समझ को झूठा साबित कर दिया।
इतने मे मेरी पिताजी जो बाथरूम गए हुए थे वो वापस आ गए, उनके इतना कहने के बाद वहां पर जो लोग भी मौजूद थे उन सबने उन अंकल से बोला की क्या बेकार की बात कर रहे हो? इसमे हिंदू - मुस्लिम की बात कहाँ से आ गई? उस बच्चे ने सिर्फ़ इतना ही कहा था की बीढ़ी बुझा दो, ग़लत तो नही कहा था, तुम ट्रेन मे बीढ़ी पी रहे जो की कानूनन जुर्म है....पिताजी ने जब हंगामा होते देखा तो उन्होंने पूछा की क्या हुआ? मैंने उन्हें थोडी बहुत बात बता दी लेकिन मैंने उन्हें यह नही बताया की उन्होंने मुझसे क्या कहा था, उसके बाद भी वो पिताजी से लड़ने लगे, वो तो मारपीट करने की लिए अपनी बर्थ से उतर कर आ गए थे, लेकिन वहां मौजूद लोगो ने बीच बचाव करा दिया, बात खतम हो गई, लेकिन यह बात मेरे लिए ख़तम नही हुई थी मैं पुरी रात अपनी बर्थ पर लेटा सोचता रहा, नींद मेरी आंखों से कोसो दूर रह - रह कर कानो मे वो आवाज़ गूंज रही थी, उनकी आवाज़ मे जो कड़वाहट थी वो भुलाए नही भूलती है, उनकी आंखों मे मुझे बहुत नफरत दिखाई दी थी, मुसलमानों के लिए......
पुरी रात सोचते - सोचते निकल गई, मेरे दिल मे बहुत सारे सवाल आ रहे है, जिनके जवाब तलाशने हैं:-
क्या मुसलमान भारतवासी नही है?
क्या मुसलमानों को हिन्दुस्तान मे रहने का हक़ नही हैं?
क्या हिन्दुस्तान मुसलमानों का मुल्क नही है?
क्या यह देश सिर्फ़ हिन्दुओं का है?
क्या जो लोग आज़ादी से पहले से यहाँ रहते आ रहे हैं, और जिनके पुरखो ने आज़ादी की ज़ंग मे हिस्सा लिया वो यहाँ रहने के लायक नही हैं?
क्या कुछ मुसलमानों का अपने लिए अलग ज़मीन माँगना, सारे मुसलमानों के लिए इतना भारी पड़ेगा की उनके
मुल्क मे उन्हें पराया माना जाए?
क्या कुछ लोगो की ग़लत हरकतों की सज़ा पुरी कौम्म को देना सही है?
क्या आपको पता है जब किसी आदमी को लोग शक की नजरो से देखते है कितनी तकलीफ होती है?
क्या आपको पता है जब स्टेशन पर पुलिस वाला सब को छोड़ कर आपसे पूछताछ करता है तो कैसा लगता है?
तब आपको कैसा लगेगा जब कमरा किराये पर देने से पहले आपका धर्म पुछा जाता है?
क्या कभी किसी आम मुसलमान की ज़िन्दगी को आपने गौर से देखा है? कभी देखियेगा, वो सुबह उठेगा, नमाज़ पड़ेगा, और रोजाना के काम करने के बाद अपने काम पर निकल जाएगा, शाम को फिर वापस घर। एक आम हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिख या किसी धर्म या जाती का हो, इन सब आम आदमियों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मे सिर्फ़ एक फर्क हैं वो हैं अपने इश्वर को याद करने का तरीका, उसकी पूजा करने का तरीका, बस इसके अलावा सब कुछ एक सा है।
मेरी बात को ज़रा अकेले मे बैठ कर sochiयेगा, क्या यह जो हम लोग एक धर्म के लोगो के साथ कर रहे हैं, क्या वो सही है?
इतने मे मेरी पिताजी जो बाथरूम गए हुए थे वो वापस आ गए, उनके इतना कहने के बाद वहां पर जो लोग भी मौजूद थे उन सबने उन अंकल से बोला की क्या बेकार की बात कर रहे हो? इसमे हिंदू - मुस्लिम की बात कहाँ से आ गई? उस बच्चे ने सिर्फ़ इतना ही कहा था की बीढ़ी बुझा दो, ग़लत तो नही कहा था, तुम ट्रेन मे बीढ़ी पी रहे जो की कानूनन जुर्म है....पिताजी ने जब हंगामा होते देखा तो उन्होंने पूछा की क्या हुआ? मैंने उन्हें थोडी बहुत बात बता दी लेकिन मैंने उन्हें यह नही बताया की उन्होंने मुझसे क्या कहा था, उसके बाद भी वो पिताजी से लड़ने लगे, वो तो मारपीट करने की लिए अपनी बर्थ से उतर कर आ गए थे, लेकिन वहां मौजूद लोगो ने बीच बचाव करा दिया, बात खतम हो गई, लेकिन यह बात मेरे लिए ख़तम नही हुई थी मैं पुरी रात अपनी बर्थ पर लेटा सोचता रहा, नींद मेरी आंखों से कोसो दूर रह - रह कर कानो मे वो आवाज़ गूंज रही थी, उनकी आवाज़ मे जो कड़वाहट थी वो भुलाए नही भूलती है, उनकी आंखों मे मुझे बहुत नफरत दिखाई दी थी, मुसलमानों के लिए......
पुरी रात सोचते - सोचते निकल गई, मेरे दिल मे बहुत सारे सवाल आ रहे है, जिनके जवाब तलाशने हैं:-
क्या मुसलमान भारतवासी नही है?
क्या मुसलमानों को हिन्दुस्तान मे रहने का हक़ नही हैं?
क्या हिन्दुस्तान मुसलमानों का मुल्क नही है?
क्या यह देश सिर्फ़ हिन्दुओं का है?
क्या जो लोग आज़ादी से पहले से यहाँ रहते आ रहे हैं, और जिनके पुरखो ने आज़ादी की ज़ंग मे हिस्सा लिया वो यहाँ रहने के लायक नही हैं?
क्या कुछ मुसलमानों का अपने लिए अलग ज़मीन माँगना, सारे मुसलमानों के लिए इतना भारी पड़ेगा की उनके
मुल्क मे उन्हें पराया माना जाए?
क्या कुछ लोगो की ग़लत हरकतों की सज़ा पुरी कौम्म को देना सही है?
क्या आपको पता है जब किसी आदमी को लोग शक की नजरो से देखते है कितनी तकलीफ होती है?
क्या आपको पता है जब स्टेशन पर पुलिस वाला सब को छोड़ कर आपसे पूछताछ करता है तो कैसा लगता है?
तब आपको कैसा लगेगा जब कमरा किराये पर देने से पहले आपका धर्म पुछा जाता है?
क्या कभी किसी आम मुसलमान की ज़िन्दगी को आपने गौर से देखा है? कभी देखियेगा, वो सुबह उठेगा, नमाज़ पड़ेगा, और रोजाना के काम करने के बाद अपने काम पर निकल जाएगा, शाम को फिर वापस घर। एक आम हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिख या किसी धर्म या जाती का हो, इन सब आम आदमियों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मे सिर्फ़ एक फर्क हैं वो हैं अपने इश्वर को याद करने का तरीका, उसकी पूजा करने का तरीका, बस इसके अलावा सब कुछ एक सा है।
मेरी बात को ज़रा अकेले मे बैठ कर sochiयेगा, क्या यह जो हम लोग एक धर्म के लोगो के साथ कर रहे हैं, क्या वो सही है?
शनिवार, 20 सितंबर 2008
इन्होने तो मुसलमानों को आतंकवादी और देशद्रोही साबित कर दिया !!
"अमिताभ बुधौलिया 'फरोग' जी" ने "भड़ास" और अपने ब्लॉग "गिद्ध" पर एक पोस्ट लिखी थी उसमे उन्होंने जो लिखा मैं उनकी भावनाओ की इज्ज़त करता हूँ लेकिन उन्होंने ना - ना करते करते आपने मुसलमानों को आतंकवादी और देशद्रोही साबित कर दिया, और बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद् की पुरी तरह से वकालत की है,
सिमी पर तो प्रतिबन्ध लगा हुआ है और सिमी ने जितने भी हमले किए उसमे से कोई भी हमला किसी धर्म विशेष पर नही था लेकिन बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद् ने सिर्फ़ एक धर्म के लोगो और उनके धर्म स्थलों को निशाना बनाया है तो उन्हें कैसे धर्म निरपेक्ष कह सकते हो? आप लोग ही बताये उन पर प्रतिबन्ध क्योँ नही लगाया जाए?
इस्लाम क्या किसी धर्म में यह नही बताया गया है की दूसरे धर्म के लोगो को जीने ना दो, उन्हें और उन्हें धर्म स्थलों को तबाह कर दो.... इस्लाम तो अपने मानने वालो को कुरान में आदेश देता है की "दुसरो के माबुदो (उपास्यो) को बुरा ना कहो (सूरा-ए-अलंफाल : आयत-१०८) |' पाक कुरान में खुदा का हुक्म है, "जिसने एक बेकुसूर का कत्ल किया, गोया उसने सारी इंसानियत का कत्ल कर दिया सूरा-ए-अल्मायेदाह : आयत - 108) |' आख़िर यह कौन से जेहादी हैं और इनका कौन सा मज़हब है, जो बेगुनाह लोगो की जान लेने को इन्हे आतुर करता है | दिल्ली बम काण्ड को ले, तो यह बात समझ नही आती की क्या कोई सच्चा मुस्लिम, और वे भी रमजान के पाक महीने में ऐसा जघन्य पाप करेगा | साफ़ है, आतंक्वादियौं का कोई धर्म और ईमान नही होता |
आज मुस्लिम समाज में कुछ लोग ऐसे हैं, जो इस्लाम की मानवतावादी शिक्षाओ से कोसो दूर हैं | ऐसे लोगो की गैर इस्लामी हरकतों से इस्लाम का नाम बदनाम होता होता है | इस्लाम का नाम बदनाम करने वाले आतंकवादी चाहे कश्मीर में हों, अफगानिस्तान में हों, पाकिस्तान में हों, अमेरिका में हों, या इंडोनेशिया में, ये सभी इंसानियत और मज़हब पर बदनुमा दाग हैं | इस्लाम अपने मानने वालो को ये आदेश भी देता है की बुढो, बच्चो और औरतों पर हथियार न उठाओ, किसी भी धर्मस्थल में बैठे हुए राहिबो व सन्यासियों पर हमला न करो | किसी ऐसे आदमी पर हमला न करो और ऐसे आदमी से न लड़ो, जो मुकाबला करने की हालत में न हो | मगर आतंकियों ने कभी इन नसीहतो को नही पढ़ा | सिर्फ़ नाम मुसलमान का और बाप - दादा के मुसलमान होने कोई मुसलमान नही हो जाता हैं,
इस्लाम एक आधुनिक धर्म है और धर्म से अधिक जीवन व्यतीत करने की कला है | इसीलिए एक आम मुस्लिम इन आतंकी हमलो की कभी हिमायत नही करता, मगर यह कुबूलने में कोई गुरेज़ नही की लगातार हो रहे आतंकी विस्फोटो के पीछे के तथाकथीत अक्स ने एक समूचे समुदाय के ऐतबार को चोट पहुचाई है |
इस्लाम को इन जेहादियों ने एक हिंसक रूप में पेश किया है, जबकि इसका नाता तो सूफी फलसफे से जुड़ा है और यह तलवार से नही, बल्कि सुफियान सोच और मोहब्बत से दुनिया भर में फैला है | पाक कुरान में तीसवें पारे (अध्याय) की सुरा-ए-अल्काफिरून में लिखा है, 'लकुम दिनोकुम वली यदिन' अर्थार्त तुम्हे तुम्हारा धर्म मुबारक, हमें हमारा धर्म मुबारक | कुरान में कहीं नही लिखा की दकाज़नी करो, खूरेंजी करो या दूसरो की जान लो | सच्चाई तो यह है की रहमदिली को इस्लाम का जौहर माना गया है |
कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं की क्या कुरान के यह संदेश ओसामा बिन लादेन, मुल्ला उमर, मसूद अजहर आदि ने नही पढ़े होंगे? इसके जवाब में यह प्रश्न पुछा जा सकता है की क्या इस्लाम के असली ठेकेदार और मुल्ला यही लोग हैं? एक कहावत है, नीम हकीम खतरा ऐ जान और नीम मुल्ला खतरा ऐ ईमान | जेहाद का नाम लेकर बेगुनाह लोगो की हत्या कर रहे लोग शायद ये नही जानते की जेहाद का अर्थ हज़रात मोहम्मद ने अपने नफ्स (इन्द्रियों) से लड़ना बताया है |
सिमी पर तो प्रतिबन्ध लगा हुआ है और सिमी ने जितने भी हमले किए उसमे से कोई भी हमला किसी धर्म विशेष पर नही था लेकिन बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद् ने सिर्फ़ एक धर्म के लोगो और उनके धर्म स्थलों को निशाना बनाया है तो उन्हें कैसे धर्म निरपेक्ष कह सकते हो? आप लोग ही बताये उन पर प्रतिबन्ध क्योँ नही लगाया जाए?
इस्लाम क्या किसी धर्म में यह नही बताया गया है की दूसरे धर्म के लोगो को जीने ना दो, उन्हें और उन्हें धर्म स्थलों को तबाह कर दो.... इस्लाम तो अपने मानने वालो को कुरान में आदेश देता है की "दुसरो के माबुदो (उपास्यो) को बुरा ना कहो (सूरा-ए-अलंफाल : आयत-१०८) |' पाक कुरान में खुदा का हुक्म है, "जिसने एक बेकुसूर का कत्ल किया, गोया उसने सारी इंसानियत का कत्ल कर दिया सूरा-ए-अल्मायेदाह : आयत - 108) |' आख़िर यह कौन से जेहादी हैं और इनका कौन सा मज़हब है, जो बेगुनाह लोगो की जान लेने को इन्हे आतुर करता है | दिल्ली बम काण्ड को ले, तो यह बात समझ नही आती की क्या कोई सच्चा मुस्लिम, और वे भी रमजान के पाक महीने में ऐसा जघन्य पाप करेगा | साफ़ है, आतंक्वादियौं का कोई धर्म और ईमान नही होता |
आज मुस्लिम समाज में कुछ लोग ऐसे हैं, जो इस्लाम की मानवतावादी शिक्षाओ से कोसो दूर हैं | ऐसे लोगो की गैर इस्लामी हरकतों से इस्लाम का नाम बदनाम होता होता है | इस्लाम का नाम बदनाम करने वाले आतंकवादी चाहे कश्मीर में हों, अफगानिस्तान में हों, पाकिस्तान में हों, अमेरिका में हों, या इंडोनेशिया में, ये सभी इंसानियत और मज़हब पर बदनुमा दाग हैं | इस्लाम अपने मानने वालो को ये आदेश भी देता है की बुढो, बच्चो और औरतों पर हथियार न उठाओ, किसी भी धर्मस्थल में बैठे हुए राहिबो व सन्यासियों पर हमला न करो | किसी ऐसे आदमी पर हमला न करो और ऐसे आदमी से न लड़ो, जो मुकाबला करने की हालत में न हो | मगर आतंकियों ने कभी इन नसीहतो को नही पढ़ा | सिर्फ़ नाम मुसलमान का और बाप - दादा के मुसलमान होने कोई मुसलमान नही हो जाता हैं,
इस्लाम एक आधुनिक धर्म है और धर्म से अधिक जीवन व्यतीत करने की कला है | इसीलिए एक आम मुस्लिम इन आतंकी हमलो की कभी हिमायत नही करता, मगर यह कुबूलने में कोई गुरेज़ नही की लगातार हो रहे आतंकी विस्फोटो के पीछे के तथाकथीत अक्स ने एक समूचे समुदाय के ऐतबार को चोट पहुचाई है |
इस्लाम को इन जेहादियों ने एक हिंसक रूप में पेश किया है, जबकि इसका नाता तो सूफी फलसफे से जुड़ा है और यह तलवार से नही, बल्कि सुफियान सोच और मोहब्बत से दुनिया भर में फैला है | पाक कुरान में तीसवें पारे (अध्याय) की सुरा-ए-अल्काफिरून में लिखा है, 'लकुम दिनोकुम वली यदिन' अर्थार्त तुम्हे तुम्हारा धर्म मुबारक, हमें हमारा धर्म मुबारक | कुरान में कहीं नही लिखा की दकाज़नी करो, खूरेंजी करो या दूसरो की जान लो | सच्चाई तो यह है की रहमदिली को इस्लाम का जौहर माना गया है |
कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं की क्या कुरान के यह संदेश ओसामा बिन लादेन, मुल्ला उमर, मसूद अजहर आदि ने नही पढ़े होंगे? इसके जवाब में यह प्रश्न पुछा जा सकता है की क्या इस्लाम के असली ठेकेदार और मुल्ला यही लोग हैं? एक कहावत है, नीम हकीम खतरा ऐ जान और नीम मुल्ला खतरा ऐ ईमान | जेहाद का नाम लेकर बेगुनाह लोगो की हत्या कर रहे लोग शायद ये नही जानते की जेहाद का अर्थ हज़रात मोहम्मद ने अपने नफ्स (इन्द्रियों) से लड़ना बताया है |
बुधवार, 20 अगस्त 2008
"भगवान्" का शाब्दिक अर्थ क्या है?
आप लोग पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर चौंक गए होंगे की हिन्दुस्तानी को क्या हो गया है यह कैसा सवाल कर रहा है? तो आप लोग ज़रा अपने दिमाग को काबू में रखे और बराए मेहेरबानी इस पोस्ट को पुरा पढ़े...
आज से कुछ दिनों पहले में फैजाबाद जाने के लिए आगरा से मरुधर एक्सप्रेस में चढा था....अपने स्लीपर कोच में पहुचने के बाद मुझे पता चला की मेरा टिकेट अपग्रेड हो गया है.....भला हो लालू जी का जिनकी वजह से मुझ जैसे मद्ध्यम वर्ग के इनसां को एसी में सफर का मौका मिला था.....मैं अपने कोच में पहुच गया और लेटकर सो गया...
सुबह आँख खुली तो ट्रेन लेट थी.....हमेशा की तरह तो नीचे आकर बैठ गया वहां पर कुछ लोग आपस में बातचीत कर रहे थे और बातचीत का विषय था आज का दौर और इंसान......मैं बैठा हुआ उन लोगो की बातचीत सुनता रहा तो उनलोगों में एक चौबीस - पच्चीस साल का नौजवान था, तीन अधेड़ उम्र के लोग और मैं बैठा था.....
बात होते -२ पाप और पुण्य पर आगई तो उस नौजवान ने बोला की हमारे जिस्म में इतनी बीमारियाँ पैदा हो रही है रोज़ एक नई बीमारी की ख़बर आ रही है...उन सब बीमारियों में से सबसे ज़्यादा हमारे खून में जन्म ले रहीं है.......उसकी सबसे बड़ी वजह की हम लोग अपनर धर्म और धर्म ग्रंथो से दूर हो गए है और झूठ - बेईमानी की रोटी खा रहे है, जब हमारे जिस्म में बेईमानी और झूठ की रोटी जा रही है तो उससे बना खून भी तो ख़राब होगा.....मैं उसकी बात से पुरी तरह से सहमत था......
उसकी यह बात सुनते ही पास वाले पार्टीशन से एक अंकल जी निकल कर आ गए और उन्होंने आते ही उस लड़के की बात को काटा की ऐसा सब कहते है लेकिन कोई उस पर अमल नही कर पाता है.....यह सब बेकार की बात है इससे कुछ नही होता है......तो उसे लड़के ने पहले गीता का एक शलोक सुनाया उसके बाद कुरान की एक आयत सुनाई, फिर दोनों का मतलब बताया इस तरह बात का रुख धर्म की तरफ़ हो गया अब सिर्फ़ उन दो लोगो में बातचीत हो रही बाकी लोग सिर्फ़ सुन रहे थे काफ़ी देर तक दोनों में बहस हो रही थी अंकल जी कुछ ज़्यादा ही जज़्बात में बोल रहे थे उनकी बात में दम नही लेकिन वो लड़का जो भी बोल रहा था पहले किसी न किसी धर्म - ग्रन्थ का हवाला देकर बोल रहा था इतनी कम उम्र में उसके पास बहुत ज़्यादा जानकारी थी जिसको सुनकर में आश्चर्य में पढ़ गया था, मैं बस बैठा उसकी बात सुन रहा था अब वहां पर काफ़ी लोग जमा हो गए थे, अंकल जी के काफ़ी पढ़े लिखे थे वो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे लेकिन जिस भाषा का इस्तेमाल वो कर रहे थे वो बहुत साम्प्रदायिक थी, जब भी वो लड़का कुरान की किसी आयत का उदाहरण देता तो वो उसे नकार देते थे, और गीता, रामायण, या और किसी हिंदू धर्म - ग्रन्थ का हवाला देता तो वो उसे कुबूल कर लेते थे यह सब देख मुझे कुछ अच्छा नही लगा की इतना बड़ा शिक्षक जिसकी उम्र लगभग ६० - ६५ के आसपास होगी वो ऐसी बात कर रहा है, जब काफ़ी देर हो गई उनको इस्लाम की बुराई करते हुए तो उस लड़के ने सिर्फ़ एक सवाल पुछा की "भगवान् किसे कहते है?" तो वहां मौजूद लोगो ने अपनी समझ के हिसाब से जवाब दिया...किसी ने कहा दुनिया को चलाने वाला, किसी ने कुछ कहा....तो उसने कहा की उसका शाब्दिक अर्थ बताये वहां मौजूद कोई भी शख्स उसके सवाल का जवाब नही दे सका....
आज से कुछ दिनों पहले में फैजाबाद जाने के लिए आगरा से मरुधर एक्सप्रेस में चढा था....अपने स्लीपर कोच में पहुचने के बाद मुझे पता चला की मेरा टिकेट अपग्रेड हो गया है.....भला हो लालू जी का जिनकी वजह से मुझ जैसे मद्ध्यम वर्ग के इनसां को एसी में सफर का मौका मिला था.....मैं अपने कोच में पहुच गया और लेटकर सो गया...
सुबह आँख खुली तो ट्रेन लेट थी.....हमेशा की तरह तो नीचे आकर बैठ गया वहां पर कुछ लोग आपस में बातचीत कर रहे थे और बातचीत का विषय था आज का दौर और इंसान......मैं बैठा हुआ उन लोगो की बातचीत सुनता रहा तो उनलोगों में एक चौबीस - पच्चीस साल का नौजवान था, तीन अधेड़ उम्र के लोग और मैं बैठा था.....
बात होते -२ पाप और पुण्य पर आगई तो उस नौजवान ने बोला की हमारे जिस्म में इतनी बीमारियाँ पैदा हो रही है रोज़ एक नई बीमारी की ख़बर आ रही है...उन सब बीमारियों में से सबसे ज़्यादा हमारे खून में जन्म ले रहीं है.......उसकी सबसे बड़ी वजह की हम लोग अपनर धर्म और धर्म ग्रंथो से दूर हो गए है और झूठ - बेईमानी की रोटी खा रहे है, जब हमारे जिस्म में बेईमानी और झूठ की रोटी जा रही है तो उससे बना खून भी तो ख़राब होगा.....मैं उसकी बात से पुरी तरह से सहमत था......
उसकी यह बात सुनते ही पास वाले पार्टीशन से एक अंकल जी निकल कर आ गए और उन्होंने आते ही उस लड़के की बात को काटा की ऐसा सब कहते है लेकिन कोई उस पर अमल नही कर पाता है.....यह सब बेकार की बात है इससे कुछ नही होता है......तो उसे लड़के ने पहले गीता का एक शलोक सुनाया उसके बाद कुरान की एक आयत सुनाई, फिर दोनों का मतलब बताया इस तरह बात का रुख धर्म की तरफ़ हो गया अब सिर्फ़ उन दो लोगो में बातचीत हो रही बाकी लोग सिर्फ़ सुन रहे थे काफ़ी देर तक दोनों में बहस हो रही थी अंकल जी कुछ ज़्यादा ही जज़्बात में बोल रहे थे उनकी बात में दम नही लेकिन वो लड़का जो भी बोल रहा था पहले किसी न किसी धर्म - ग्रन्थ का हवाला देकर बोल रहा था इतनी कम उम्र में उसके पास बहुत ज़्यादा जानकारी थी जिसको सुनकर में आश्चर्य में पढ़ गया था, मैं बस बैठा उसकी बात सुन रहा था अब वहां पर काफ़ी लोग जमा हो गए थे, अंकल जी के काफ़ी पढ़े लिखे थे वो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे लेकिन जिस भाषा का इस्तेमाल वो कर रहे थे वो बहुत साम्प्रदायिक थी, जब भी वो लड़का कुरान की किसी आयत का उदाहरण देता तो वो उसे नकार देते थे, और गीता, रामायण, या और किसी हिंदू धर्म - ग्रन्थ का हवाला देता तो वो उसे कुबूल कर लेते थे यह सब देख मुझे कुछ अच्छा नही लगा की इतना बड़ा शिक्षक जिसकी उम्र लगभग ६० - ६५ के आसपास होगी वो ऐसी बात कर रहा है, जब काफ़ी देर हो गई उनको इस्लाम की बुराई करते हुए तो उस लड़के ने सिर्फ़ एक सवाल पुछा की "भगवान् किसे कहते है?" तो वहां मौजूद लोगो ने अपनी समझ के हिसाब से जवाब दिया...किसी ने कहा दुनिया को चलाने वाला, किसी ने कुछ कहा....तो उसने कहा की उसका शाब्दिक अर्थ बताये वहां मौजूद कोई भी शख्स उसके सवाल का जवाब नही दे सका....
इतने में उसका स्टेशन आ गया तो उसने वहां मौजूद हर शख्स को अपना मेल एड्रेस किया और कहा की आप लोग अपनी तरह से इस सवाल का जवाब पता कीजिये और मुझे बताये फिर मैं आप लोगो को बताऊँगा की "भगवान्" का शाब्दिक अर्थ क्या है?"
मुझे तो पता नही है इसलिए मैंने सोचा अपने पाठको से पूछ लूँ तो कृपया करके इस पोस्ट को पढने के बाद अपने विचार ज़रूर बताये धन्यवाद
मंगलवार, 8 जुलाई 2008
इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बहुत ग़लतफ़हमियाँ है....
सबसे पहले आप सभी भाई बंधुओ का तहेदिल से शुक्रिया जिन्होंने मेरी पोस्ट को पढ़ कर अपने विचार प्रकट किए । मैं आप लोगो के विचारों की इज्ज़त करता हूँ ।
मैं आपके सब सवालों का जवाब दूंगा तो सबसे पहले रोहित त्रिपाठी जी के सवाल का जवाब दूंगा उन्होंने पुछा है की जितने आतंकवादी पकड़े गए वो सब मुसलमान क्योँ है?
पहली बात क्या आपको यकीन है की जो लोग पकड़े गए वो असलियत में आतंकवादी थे या बेकुसूर थे? आपने उनके कुसूरवार होने का फ़ैसला कैसे कर दिया? चलिए मैं मानता हूँ की सब गुनाहगार थे तो उन्होंने जो हमले किए उन हमलो में मरने और घायल होने वाले सब लोग हिंदू थे? उसमे कोई मुसलमान नही था? या जिन लोगो का नुक्सान हुआ था उसमे से कोई मुसलमान नही था? और अगर नही था तब भी मैं पूछता हूँ उसमे सारी दुनिया के मुसलमानों का क्या कसूर?
अगर एक घर के पाँच बेटो में एक बेटा गुंडा बन जाए और बाकी सब डॉक्टर, साइंटिस्ट, वगेरह हो तो क्या उस गुंडे के कर्मो की सज़ा कानून सारे बेटो को देगा? नही जिसने जो कर्म किए उसकी सज़ा सिर्फ़ उसे ही मिलनी चाहिए । आतंक्वादियौं का कोई धर्म - ईमान नही होता है ।
संजय शर्मा जी गुप्ता जी और मेरी बात में एक फर्क है जिस वजह से मुझे लिखना पड़ा वो बात थी की उन्होंने सिर्फ़ हिंदू धर्म की बात की थी बाकी और धर्मो की नही मैंने तो बस उनकी बात को थोड़ा सा सही किया है और कुछ उन्होंने कहा की हिंदू धर्म में किसी से नफरत करना नही सिखाया जाता है तो मैंने बता दिया की दुनिया के किसी धर्म में यह नही सिखाया जाता है.....रही बात काफिर के साथ क्या करना चाहिए तो कुरान में है की काफिर को इस्लाम की दावत दो लेकिन सिर्फ़ ज़बान से....उसके साथ कोई ज़बरदस्ती नही करना और ना ही उसको इस्लाम कुबूल करने के लिए मजबूर कीजिये।
राज भाटिया जी आप मेरे बड़े है मैं आपकी बात की इज्ज़त करता हूँ लेकिन मैं आपको बात को सही करना चाहूँगा की काफिर का मतलब नास्तिक नही होता है क्यूंकि नास्तिक किसी भगवान् में यकीन नही करता है। और काफिर का मतलब होता है इनकारी.....जिसने अल्लाह के हुक्म से इनकार किया, मोहम्मद साहब को अल्लाह का संदेशवाहक नही माना, उनकी बात पर यकीन नही किया, उसे काफिर कहते है
सुनील डोगरा जालिम जी मैंने उनकी उम्र पर कोई टिप्पणी नही की थी दरअसल मैंने उनकी उम्र इसलिए बताई थी क्यूंकि इतनी दुनिया देखने के बावजूद उन्होंने इस तरह की टिप्पणी की ।
ab inconvenienti जी यहूदियों ने अल्लाह के संदेशवाहक हजरत उजैर को खुदा का बेटा करार दे दिया इसलिए उनको काफिर कहा जाता है और अल्लाह की कोई औलाद नही है । काफिर के प्रति सच्चे मुसलमान के कर्तव्य यह है की वो उसको इस्लाम की दावत दे मगर सिर्फ़ जुबां से, उसे इस्लाम की खुबियौं के बारे में बताये, उससे नफरत ना करे, उसे किसी भी तरह का नुक्सान पहुचाने की कोशिश भी ना करे, उसके साथ किसी भी तरह की ज़ोर- ज़बरदस्ती ना करे, ना उसको इस्लाम कुबूल करने को मजबूर करे .
अगर किसी भाई के मन में कोई सवाल हो तो वो बेझिझक पूछ सकता है...
तो मेरी आप सब लोगो से गुजारिश है की हिंदू - मुस्लिम के झगडे से दूर रहे और सगे भाइयो की तरह रहे और हाथ से हाथ मिला कर हिन्दुस्तान को नई ऊंचाई पर ले जाए..... जय हिंद
मैं आपके सब सवालों का जवाब दूंगा तो सबसे पहले रोहित त्रिपाठी जी के सवाल का जवाब दूंगा उन्होंने पुछा है की जितने आतंकवादी पकड़े गए वो सब मुसलमान क्योँ है?
पहली बात क्या आपको यकीन है की जो लोग पकड़े गए वो असलियत में आतंकवादी थे या बेकुसूर थे? आपने उनके कुसूरवार होने का फ़ैसला कैसे कर दिया? चलिए मैं मानता हूँ की सब गुनाहगार थे तो उन्होंने जो हमले किए उन हमलो में मरने और घायल होने वाले सब लोग हिंदू थे? उसमे कोई मुसलमान नही था? या जिन लोगो का नुक्सान हुआ था उसमे से कोई मुसलमान नही था? और अगर नही था तब भी मैं पूछता हूँ उसमे सारी दुनिया के मुसलमानों का क्या कसूर?
अगर एक घर के पाँच बेटो में एक बेटा गुंडा बन जाए और बाकी सब डॉक्टर, साइंटिस्ट, वगेरह हो तो क्या उस गुंडे के कर्मो की सज़ा कानून सारे बेटो को देगा? नही जिसने जो कर्म किए उसकी सज़ा सिर्फ़ उसे ही मिलनी चाहिए । आतंक्वादियौं का कोई धर्म - ईमान नही होता है ।
संजय शर्मा जी गुप्ता जी और मेरी बात में एक फर्क है जिस वजह से मुझे लिखना पड़ा वो बात थी की उन्होंने सिर्फ़ हिंदू धर्म की बात की थी बाकी और धर्मो की नही मैंने तो बस उनकी बात को थोड़ा सा सही किया है और कुछ उन्होंने कहा की हिंदू धर्म में किसी से नफरत करना नही सिखाया जाता है तो मैंने बता दिया की दुनिया के किसी धर्म में यह नही सिखाया जाता है.....रही बात काफिर के साथ क्या करना चाहिए तो कुरान में है की काफिर को इस्लाम की दावत दो लेकिन सिर्फ़ ज़बान से....उसके साथ कोई ज़बरदस्ती नही करना और ना ही उसको इस्लाम कुबूल करने के लिए मजबूर कीजिये।
राज भाटिया जी आप मेरे बड़े है मैं आपकी बात की इज्ज़त करता हूँ लेकिन मैं आपको बात को सही करना चाहूँगा की काफिर का मतलब नास्तिक नही होता है क्यूंकि नास्तिक किसी भगवान् में यकीन नही करता है। और काफिर का मतलब होता है इनकारी.....जिसने अल्लाह के हुक्म से इनकार किया, मोहम्मद साहब को अल्लाह का संदेशवाहक नही माना, उनकी बात पर यकीन नही किया, उसे काफिर कहते है
सुनील डोगरा जालिम जी मैंने उनकी उम्र पर कोई टिप्पणी नही की थी दरअसल मैंने उनकी उम्र इसलिए बताई थी क्यूंकि इतनी दुनिया देखने के बावजूद उन्होंने इस तरह की टिप्पणी की ।
ab inconvenienti जी यहूदियों ने अल्लाह के संदेशवाहक हजरत उजैर को खुदा का बेटा करार दे दिया इसलिए उनको काफिर कहा जाता है और अल्लाह की कोई औलाद नही है । काफिर के प्रति सच्चे मुसलमान के कर्तव्य यह है की वो उसको इस्लाम की दावत दे मगर सिर्फ़ जुबां से, उसे इस्लाम की खुबियौं के बारे में बताये, उससे नफरत ना करे, उसे किसी भी तरह का नुक्सान पहुचाने की कोशिश भी ना करे, उसके साथ किसी भी तरह की ज़ोर- ज़बरदस्ती ना करे, ना उसको इस्लाम कुबूल करने को मजबूर करे .
अगर किसी भाई के मन में कोई सवाल हो तो वो बेझिझक पूछ सकता है...
तो मेरी आप सब लोगो से गुजारिश है की हिंदू - मुस्लिम के झगडे से दूर रहे और सगे भाइयो की तरह रहे और हाथ से हाथ मिला कर हिन्दुस्तान को नई ऊंचाई पर ले जाए..... जय हिंद
सोमवार, 7 जुलाई 2008
हिन्दू - मुस्लिम के झगडे से हम दूर रहे तो ही अच्छा है....
सुनील डोगरा जी ने एक जुलाई को एक पोस्ट लिखी थी काश ! मैं मुसलमान होता... वो उन्होंने बहुत अच्छा लिखा था और उनकी प्रश्न भी सही था लेकिन उस पोस्ट पर सुरेश चंद्र गुप्ता जी ने जो टिप्पणी दी मैं उससे बिल्कुल भी सहमत नही हूँ ।
सुरेश जी जो ६१ वर्ष के हैं उनसे ऐसी टिप्पणी की उम्मीद नही थी.....
शायद उनको काफिर का मतलब नही पता है ठीक है तो मैं उनको बताता हूँ क्यूंकि मैंने मुसलमानों को बहुत करीब से देखा है.
काफिर का मतलब होता है :- इन्कारी . जो अल्लाह के वजूद से इनकार करता है और जो हर हिंदू करता है तो मेरे हिसाब से किसी हिंदू को काफिर कहने में कोई बुराई नही है और रही बात हिंदूं पर हमला करने की तो मैं आपको बता दूँ इस्लाम या दुनिया के किसी भी धर्म में यह नही सिखाया गया है किसी दुसरे धर्म के लोगो की जान लो....
बल्कि हर धर्म में यह बताया गया है की सब के साथ मिल कर रहो और अगर तुम्हारे ऊपर कोई हमला करता है तो उससे अपने धर्म और अपने लोगो की रक्षा करो....जो हर आदमी करता है...
सुरेश चंद्र जी ने अपनी प्रोफाइल में इंटेरेस्ट कालम में लिखा है की Let us take our country on path to top तो क्या हमारा इंडिया ऐसे टॉप पर जायेगा जब हम हिंदू - मुस्लिम के झगडे में पड़े रहेंगे तो कहाँ से तरक्की करेंगे???
हम लोग फिर वही गलती कर रहे हैं जो हमारे बडों ने की तभी तो वो अँगरेज़ हमारे ऊपर २०० - २५० साल तक राज करके चले गए अगर इसी तरह से यह सब चलता रहा तो फिर कोई हमारे ऊपर राज करने लगेगा.....
अरे हमेशा से मुसलमान यहाँ रहते आ रहे है तो फिर क्या परेशानी है वो हमारे भाई है और भाई से हमेशा मोहब्बत की जाती उससे लड़ा नहीं जाता है क्यूंकि भाई से लड़ने में हमेशा नुक्सान ही होता है...
तो अगर हम सब अपने हिन्दुस्तान को टॉप पर देखना चाहते है तो हमें सब धर्म के लोगो को साथ लेकर चलना होगा जब सब लोग हाथ में हाथ लेकर चलेंगे तभी हमारा देश एक नयी ऊंचाई पर पहुचेगा
सुरेश जी जो ६१ वर्ष के हैं उनसे ऐसी टिप्पणी की उम्मीद नही थी.....
शायद उनको काफिर का मतलब नही पता है ठीक है तो मैं उनको बताता हूँ क्यूंकि मैंने मुसलमानों को बहुत करीब से देखा है.
काफिर का मतलब होता है :- इन्कारी . जो अल्लाह के वजूद से इनकार करता है और जो हर हिंदू करता है तो मेरे हिसाब से किसी हिंदू को काफिर कहने में कोई बुराई नही है और रही बात हिंदूं पर हमला करने की तो मैं आपको बता दूँ इस्लाम या दुनिया के किसी भी धर्म में यह नही सिखाया गया है किसी दुसरे धर्म के लोगो की जान लो....
बल्कि हर धर्म में यह बताया गया है की सब के साथ मिल कर रहो और अगर तुम्हारे ऊपर कोई हमला करता है तो उससे अपने धर्म और अपने लोगो की रक्षा करो....जो हर आदमी करता है...
सुरेश चंद्र जी ने अपनी प्रोफाइल में इंटेरेस्ट कालम में लिखा है की Let us take our country on path to top तो क्या हमारा इंडिया ऐसे टॉप पर जायेगा जब हम हिंदू - मुस्लिम के झगडे में पड़े रहेंगे तो कहाँ से तरक्की करेंगे???
हम लोग फिर वही गलती कर रहे हैं जो हमारे बडों ने की तभी तो वो अँगरेज़ हमारे ऊपर २०० - २५० साल तक राज करके चले गए अगर इसी तरह से यह सब चलता रहा तो फिर कोई हमारे ऊपर राज करने लगेगा.....
अरे हमेशा से मुसलमान यहाँ रहते आ रहे है तो फिर क्या परेशानी है वो हमारे भाई है और भाई से हमेशा मोहब्बत की जाती उससे लड़ा नहीं जाता है क्यूंकि भाई से लड़ने में हमेशा नुक्सान ही होता है...
तो अगर हम सब अपने हिन्दुस्तान को टॉप पर देखना चाहते है तो हमें सब धर्म के लोगो को साथ लेकर चलना होगा जब सब लोग हाथ में हाथ लेकर चलेंगे तभी हमारा देश एक नयी ऊंचाई पर पहुचेगा
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