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शुक्रवार, 19 जून 2009

जीने के लिए भी वक्त नही.......

आज अपना पुराना ब्लॉग देख रहा था। जो मैंने आज से ३ साल पहले बनाया था Rediffblogs पर जब ब्लॉगर ठीक से काम नही कर रहा था। उस ब्लोग को एक साल पहले से इस्तेमाल करना बन्द कर दिया था तो आज वहां पर एक कविता मिली जो पता नही किसने लिखी थी, और मैने कहां पढी थी, लेकिन अच्छी लगी थी तो उसे मैने अपने ब्लोग मे लिख दिया था तो सोचा उसे आप लोगो को भी पढा दूं।


हर खुशी है लोगों के दामन मे,
पर एक हँसी के लिए वक्त नही.
दिन रात दौड़ती दुनिया में,
जिंदगी के लिए ही वक्त नही.

माँ की लोरी का एहसास तो है,
पर माँ को माँ कहने का वक्त नही.
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक्त नही.

सारे नाम मोबाइल में हैं,
पर दोस्ती के लिए वक्त नही.
गैरों की क्या बात करें,
जब अपनों के लिए ही वक्त नही.

आंखों मे है नींद बड़ी,
पर सोने का वक्त नही.
दिल है ग़मों से भरा हुआ,
पर रोने का भी वक्त नही.

पैसों की दौड़ मे ऐसे दौडे,
की थकने का भी वक्त नही.
पराये एहसासों की क्या कद्र करें,
जब अपने सपनो के लिए ही वक्त नही.

तू ही बता ऐ जिंदगी,
इस जिंदगी का क्या होगा,
की हर पल मरने वालों को,
जीने के लिए भी वक्त नही.......




सोमवार, 8 जून 2009

अपना घुट्ना तुडा के बैठे है।

मै काफ़ी दिनो से अपने ब्लोग को एक नया रूप और रंग देने मे व्यस्त था, उसका काम पुरा हुआ तो दूसरा काम शुरु किया वो था टिप्पणी करने का काम। सब कुछ बहुत अच्छी तरह चल रहा था लेकिन क्या करे मेरे साथ हमेशा से यही होता आया है जब सब सही जा रहा होता तभी कोई गडबड हो जाती है इस बार भी हो गयी।

एक दुर्घट्ना हो गयी, मै शुक्रवार को शाम को अपनी फ़ैक्ट्री से लौट रहा था, फ़ैक्ट्री बंद करने के बाद जैसे ही वहा से चला सीढी से पैर फिसल गया सिधे निचे आकर गिरे, दाहिने घुट्ने मे बहुत असहनीय दर्द हो रहा था मैने अपने आप से कहा कि काशिफ़ भाई, तुम्हारा काम हो गया अब, बिस्तर पकड लो घर जाकर एक महिने के लिये। फिर पडोसियो ने घर पर फोन किया पिताजी और भाई साहब आये, अस्पताल गये फिर वही प्रक्रिया जिसको हम बहुत बार झेल चुके है।






सब तरह के टेस्ट करवाने के बाद हम बैठे हुए डाक्टर का चेहरा देख रहे थे की कही ये कोई बुरी खबर ना सुना दें, जब उन्होने मुंह खोला और अपनी जीब से जो बोला उसे सुनकर जान मे जान आ गयी। फ्रैक्चर नही बस "लिगामेंट डिसआडर" हो गया है १० - १५ दिन का आराम और फिर सब बढिया लेकिन एक बात कह कर उन्होने हमारा दिल तोड दिया वो ये कि दो - तीन दिन यही रुकीये अस्पताल मे। अस्पताल मे रुकने से सबसे मेरा सबसे बडा नुक्सान था की मे अपने ब्लोग से दूर हो जाऊगा वही हुआ, अभी - अभी वापसी हुई है घर पर। पैर के हालत ठीक है, घुट्ने पर एक ब्रेस बाधां है उसे ही बाधं कर चलना है।

अस्पताल मे बैठे - बैठे दो चार लाईने लिखीं है अपनी हालत पर, मैं शायर नही हु इसलिये आप से गुज़ारिश है कि पढ्ने के बाद हंसे नही ......अर्ज़ है

करने है बहुत सारे काम,
पर हम आराम से बैठे है।
क्या करे मजबूर है यार,
क्यौंकी हम अस्पताल मे बैठे है।
काट्ता है ये बिस्तर रात भर,
याद आता है हमें हमारा ब्लोग और कंप्यूटर।
दिल करता है भागने को यहां से,
पर बेवजह हम घुट्ना तुडा के बैठे है।

बुधवार, 27 मई 2009

दुनिया में अगर दर्द का मौसम नही होता

दुनिया में अगर दर्द का मौसम नही होता -
चेहरों पे तबस्सुम का ये आलम नही होता ।

क्या चीज मुहब्बत है ये हम कैसे समझते -
अश्को से अगर दामने दिल नम नही होता ।

इक वो है की माथे पे हमावत है शिकने-
इक मैं हूँ कि किसी हाल में वह हम नही होता।

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही '

शनिवार, 16 मई 2009

यूँ भी रस्मे वफ़ा...


यूँ भी रस्मे वफ़ा हम निभाते रहे
चोट
खाते रहे मुस्कुराते रहे

दिल की महफिल सजायी थी हमने मगर-
वो
रकीबो के घर आते - जाते रहे

गए वो तसस्वुर में जब कभी -
मीर
के शेर हम गुनगुनाते रहे

देखकर
जिनको चलने की आदत थी -
ठोकरे
हर कदम पर वो खाते रहे

जब भी 'राही' बुरा वक्त हम पर पड़ा -
हमसे अपने ही दामन बचाते रहे

डॉक्टर
यशवीर सिंह चंदेल ''राही''

गुरुवार, 14 मई 2009

तुझसे बेहतर तेरी अदा जाने..


जितना बढ़ चढ़ के आइना जाने॥
हुस्न क्या शै है कोई क्या जाने॥

किस की जुल्फों को छूके आई है-
महकी
महकी हुई हवा जाने

मौत किसको मिली हयात किसे-
तुझसे बेहतर तेरी अदा जाने

ऐश वालो से पूछते क्या हो-
लज्जत गम तो ये गदा जाने

यु तो रहते हो साथ साथ मगर -
कब
बिछड जाए वो खुदा जाने

किस कदर तुमसे प्यार है भगवन -
ये
मेरी अपनी आत्मा जाने

मैं वो ''राही'' हूँ जो फजले खुदा
रास्ता
सिर्फ़ प्यार का जाने


डॉक्टर
यशवीर सिंह चंदेल ''राही''

बुधवार, 13 मई 2009

जहाँ जीव की माफ़ होती खताएं...


कभी कामना कामना को लजाये॥
चलो तृप्ति के द्वार डोली सजाएं॥

मुझे आइना जो दिखाने लगे वो-
कई सूरतो में दिखी लालसायें॥

तटों को बहाने चली धार मानी
मिटी रेत के गांव की भावनाएँ॥

उडे आंधियो के सहारे -सहारे -
मिटाती रही जिंदगी वासनाएं॥

उसी राह को खोज ले पस्त ''राही''
जहाँ जीव की माफ़ होती खताएं॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ''राही''

मंगलवार, 12 मई 2009

छूट गया बचपन


उम्र की
सीढिया चढ़ते हुए,
जाने कब
किस सीढ़ी पर
छूट गया बचपन
मन पर
बङ्प्पन के खोल चढाकर
चला आया हूँ मैं
इतनी दूर
फिर भी क्यों टीस उठती है
बार-बार,
उस बिछङे हुए बच्चे की याद?
बीते हुए बचपन में
फिर फिर लौट जाने की
क्यों होती है चाह?
अकेले में,
जब कभी आईने के सामने,
खुशी में त्यौहार में,
कभी -कभी भीड़ के सामने,
कहाँ से प्रकट हो जाता है वह?
पलके झपकते,
मुहँ चिढाते ,
बच्चो के साथ
फिर से बच्चा बना देता है मुझे
जब भी कोई खुशी असह्य दुःख गहरा,
उतार देता है बङप्पन का नकाब
पल दो पल के लिए
बाहर निकल आता है बचपन
लेकिन बाकी सारे समय,
दिल के किसी अंधेरे कोने में
किसके डर से छिपा रहता है वह?
छटपटाता ,कसमसाता रहता है बचपन


-अनूप गोयल

सोमवार, 11 मई 2009

दूरियां घट सके वो मिलन कीजिये...

दूर के श्यामघन कुछ जतन कीजिये
दूरियां घट सके वो मिलन कीजिये

आह मेरी स्वयं में मिला लीजिये
अश्रु के सिन्धु से जीवनी लीजिये
पीर की बांसुरी पर थिरक जाइये-
पात तृन डालियों को हिला दीजिये

तय इतना तृप्ति आत्मा में मेरी -
शान्ति का सार अभिनव ग्रहण कीजिये



हो गए युग कई तन भिगोते हुए
दौड़ते-दौड़ते कुछ संजोते हुए
तब फुहारों ने मन को छुआ तक नही-
प्यासी बदरी से बादर लजाते हुए

घोर गर्जन का संताप मत दीजिये-
प्रीत परतीत सुंदर सुमन कीजिये

जग समझता सही आप का मर्म है
दान देना सदा आप का कर्म है
बिज़लियो को संभालना सिखा दीजिये-
घोसलों को बचाना बड़ा धर्म है

जग में हर और जीवन सजाते हुए-
विश्व के पाप का कुछ गम कीजिये

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ''राही''

शनिवार, 9 मई 2009

ख़ुद को समझो खुदा समझ लोगे



दर्द समझो दवा समझ लोगे।
ज्योति समझो
दीया समझ लोगे ।
व्यर्थ देरी हरम में उलझे हो
-
ख़ुद को समझो खुदा समझ
लोगे

कंगन कभी टूटे ऐसा कोई हाथ नही है
चंदन कभी छूटे ऐसा कोई माथ नही है
चारो और भीड़ अपनों की लेकिन रिश्तो का-
बंधन कभी न टूटे ऐसा कोई साथ नही है ।


प्यार की पहचान लेकर जी रहा हूँ।
दर्द का उनमान लेकर जी रहा हूँ
जाति
भाषा धर्म से आहत हुआ -
अधमरा
इंसान लेकर जी रहा हूँ

ये
अहिंसा मेरा मन्दिर मेरी आजादी है
कर्म से भाग पाये वो मुनादी है

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

नतुन स्वप्न


एखनो विनिद्र रजनी जागिया
सजनी जाले आधारे आलो

एखनो देखिनी प्रभात सुदिन
तबुओ स्वप्न साजाइ भालो

आशार तरीटी भाषाये सागरे
कूल भेंगे कुल गड़ी

स्तिमित आलोर प्रदीप जालाये
दियेछि
जीवन सिन्धु पाड़ी


-उत्तम शर्मा
संयोजक- भारतीय इन्साफ मोर्चा
मूल
कविता बंगला भाषा में

शुक्रवार, 8 मई 2009

बुज का पत्थर पिघलने लगे


हम जो नजरो में सजने लगे
बेवजह लोग जलने लगे

पुश्त के जख्म रिसने लगे
दोस्ती हम समझने लगे

ये प्रजातंत्र क्या तंत्र है-
खोटे सिक्के भी चलने लगे

सच इतना संवारो नही -
आइना भी मचलने लगे

आह में वो कशिश लाइए-
बुज का पत्थर पिघलने लगे

जबसे वो प्यार करने लगे -
हम मोहब्बत से डरने लगे

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'
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