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शुक्रवार, 26 जून 2009

मुझें कपडों से नही, पहनने के तरीके से शिकायत है।

दो दिन पहले मैनें एक लेख लिखा था ये शालीनता है, अश्लिलता हैं, फ़ैशन हैं, या फ़ुहडपन?

इस मे मैनें महिलाओं के पहनावे की आलोचना की थी तो इस लेख के जवाब मे मुझे काफ़ी कुछ सुनने को मिल गया।

मेरी समझ मे एक बात नही आती की लोग मेरे लेख का गलत मतलब क्यौं निकाल लेतें है? मैं कहना कुछ चाहता हु और वो समझते कुछ और है इससे पहले भी मैनें एक आलेख लिखा था एक विवाद्पस्द मुद्दे पर तब भी यही हुआ। मैं कहता हुं रात है पाठक कहते है की भोर हो गयी है, मैं कहता हुं डोसा है वो कहते है बिरयानी है।




बुधवार, 24 जून 2009

ये शालीनता है, अश्लिलता हैं, फ़ैशन हैं, या फ़ुहडपन?

मैं इस विषय पर काफ़ी दिनो से लिखना चाहता था लेकिन हर बार मसरुफ़ियत की वजह से रह जाता था लेकिन कल एक दिन मे मैनें इस विषय और इससे मिलते जुलते विषय पर पांच लेख पढें। वो लेख इस प्रकार है:-





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