बुधवार, 24 जून 2009

ये शालीनता है, अश्लिलता हैं, फ़ैशन हैं, या फ़ुहडपन?

मैं इस विषय पर काफ़ी दिनो से लिखना चाहता था लेकिन हर बार मसरुफ़ियत की वजह से रह जाता था लेकिन कल एक दिन मे मैनें इस विषय और इससे मिलते जुलते विषय पर पांच लेख पढें। वो लेख इस प्रकार है:-






मैने इन लेखों पर अपनी राय तो ज़ाहिर कर दी लेकिन इस बात को सोचें बगैर ना रह सका क्यौंकी ये चीज़ हर जगह परेशान करती है की शर्म जो औरत का गहना कही जाती थी वो गायब सी हो गयी है। तो मैनें क्यौं न इस अच्छे से विचार किया जायें और विचार करने के लिये ब्लोग से अच्छी जगह क्या हो सकती है।
बसे पहले ड्रेस कोड के बारे मे बात करते है, ड्रेस कोड के बारे मे हर किसी का अपना तर्क है कोई कहता है ये तालिबानी फ़रमान है, कोई कहता है होना चाहिये, कोई कहता है सिर्फ़ लडकियौं के लिये होना चाहिये, लेकिन मेरा ये मानना नही है मै ये मानता हु की जितने भी स्कुल - कालेज, बिज़नेस स्कुल, या ये कहे शिक्षण संस्थान है उन सब में ड्रेस कोड होना चाहिये चाहे वहां सहशिक्षा हो या सिर्फ़ लडकियां क्यौंकी जब मैं पढा करता था आगरा के सेण्ट. जोन्स कालेज मे तब ड्रेस कोड नही था मेरा आखिरी साल पुरा होते ही वहां ड्रेस कोड लागु हो गया जो दोनो के लिये हैं। मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार के ताल्लुक रखता हुं और ज़्यादा फ़ैशनेबल कपडें न मैं पहनता हुं न मेरी हैसियत है की किसी बडी बार्न्ड की जीन्स पहनूं जो दो ढाई हज़ार से कम नही आती हैं।
तो उन दिनों हमारे कालेज मे मेरी दोस्ती सब लोगो से थी लेकिन एक खेमा ऎसा था जो सबसे अलग रहता था और वो लोग थे उच्च वग्रीय परिवारॊं के चश्मोंचिराग। वो या तो कालेज नही आते थे, आते थे तो क्लास मे तो आने का सवाल ही नही होता था बाहर कम्पाउंड मे मुलाकात होती थी तो उनके पास सिर्फ़ अपने पैसे, कपडॊं, और मंहगें सामान के बारे में बात करने के अलावा कोई काम नही था। उनकी इस आदत की वजह से जो गरीब परिवारों के जो लडकें - लडकियां हमारे साथ पढतें थे वो उनसे दुर रहते थे। मेरे पुछने पर मेरा एक दोस्त बोला था कि "यार उनके साथ खडें होने मे अजीब सा लगता है उनके इतने मंहगे कपडें और मेरी ये सादा सी शर्ट"। तब मुझे एहसास हुआ तो हम आठ - दस लडको ने एक फ़ैसला लिया जो जो लोग ड्रेस कोड के हक मे थे उन सब से एक पेपर पर साईन कराकर प्रिंसिपल को दे दिया।





ये तो रही शिक्षण संस्थान की बात अब बात करते है आमतौर पर पहने जाने वाले कपडों की, सबसे पहले भारतीय परिधान साडीं और सलवार सुटसाडी को सबसे शालीन परिधानों मे गिना जाता है लेकिन आजकल ये फ़ैशन के फ़ेर मे आकर अपनी शालीनता खोती जा रही है, ये कमर से काफ़ी नीचे बांधी जा रही है नाभि से लगभग ६ इंच नीचे, ब्लाउज़ की आस्तीन गायब हो गयी है और साथ मे आगे से गले का बडा सा हिस्सा और पीछे से पीठ का काफ़ी बडा हिस्सा ले गयी है तो आगे से गला लगभग नौ इंच और पीछे से ग्यारह इंच तक पहुंच गया है। अगर ब्लाउज़ पुरा है जो ज़्यादातर बडी उम्र की औरतें पहनती है तो उसका कपडा इतना महीन और पारदर्शी होता है की आप उसमें से उनके अंत्रवस्त्र का रंग बता सकते है और साथ मे ये भी देख सकते है की कौन से नंबर के हुक मे उसे लगाया हुआ हैं। आप इसे क्या कहेंगे शालीन वस्त्र कहेंगे?
बसे बुरा हाल सलवार सुट का है वैसे तो ये साडी से ज़्यादा आरामदायक और साडी से ज़्यादा जिस्म को ढकंने वाला परिधान है लेकिन इसकी हालत बहुत खराब है साडी के ब्लाउज़ की तरह इसका कपडा भी पारदर्शी होता है पहले कमीज़ ने अन्दर एक पतली कपडें के रंग से मिलती जुलती कमीज़ पहनी जाती थी जिसे कुछ लोग इन्नर और कुछ लोग शमीज़ के नाम से जानते है उसे पहनना बन्द किया जा चुका है, कमीज़ के चाक ( दोनो साईड मे जो कट लगा होता है) कमर की हड्डी से काफ़ी उपर आ चुके है इस कारण से साईड से पुरी सलवार और अंत्रवस्त्र आप देख सकते है, सलवार पारदर्शी हो चुकी है तो आप ये तक देख सकते है लडकी ने वैक्सिंग कराई है या नही।
ब पश्चिम सभ्यता के परिधानों की बात करते है, मुझे जीन्स से परेशानी नही है मुझे परेशानी है चुस्त और नाभि से नीचे खिसकती जीन्स से जिसमें बेल्ट नही बंधी होती है उसमें से झांकते अंत्रवस्त्र और साथ मे नीचे की ओर जाती बैकलाईन जो दो-तीन ईंच से लेकर पांच ईंच तक दिखती है और टी- शर्ट इतनी छोटी होती है की वो कमर और पेट को तो ढंक नही सकती वो उसकॊ क्या ढंकेगी। मैं ऐसे बहुत सारे वाकयों का गवाह हू जिसमें लडकी को इस पहनावे की वजह से शर्मिंदगीं उठानी पडी है लेकिन फिर भी ये लोग बाज़ नही आती है।
न सब वाकयॊं मे से एक यह है की एक बार मे सदर बाज़ार जा रहा था अपनी बाईक से मेरे आगे एक लडकी अपनी गाडी पर चल रही थी उसने जीन्स और टी-शर्ट पहनी हुई, जीन्स मे बेल्ट नही थी तो जैसा अक्सर होता है उसका अंत्रवस्त्र दिख रहा था। सिग्नल पर गाडी रोकी तो वहां पहले से कुछ लडके अपनी गाडीयों पर पहले से मौजुद थे उस लडकी ने अपनी गाडी उन लडकॊं से आगे ले जाकर रोकी तो लडकी को देखते ही लडका बोला अरे यार क्या माल है? तो दुसरे ने उसमे लुक्मा जोडा गुलाबी अंत्रवस्त्र (उसने बहुत गन्दी भाषा का इस्तेमाल किया था, उसका उपयोग मैनें यहां करना सही नही समझा) पहनी है अच्छी लग रही है लेकिन और भी अच्छी लगती अगर जीन्स थोडी और नीचे होती तो। और उसके बाद वो लोग वो सब कुछ बताने लगे जो मै आपको ऊपर बता चुका हुं। पहले तो मैं ये सब देखता रहा फ़िर जब बर्दाश्त के बाहर हो गया तो मैं गाडी से उतर कर उन लडकॊं के पास गया और उनसे बात की तो जवाब मे उन्होने मुझे भला बुरा कहना शुरु कर दिया बात ज़्यादा बढती उससे पहले ही हरी बत्ती हो गयी तो वो मुझे उलटा सीधा कहते हुये चले गये। वो लडकी रोने लगी थी मैने पहले उसे सडक के बीच से हटाया, फिर अपने पास मौजुद बोतल से पानी पिलाया, कुछ देर बाद जब वो कुछ सभंल गयी तो उसने मुझसे शुक्रिया कहा तो मैने उसे एक बात कही "हर इंसान शरीफ़ नही होता तो अपनी सुरक्षा, अपनी इज़्ज़त अपने हाथ है। अगर इस वक्त आप की टी-शर्ट बडी होती और जीन्स इतने नीचे ना होती भरी सडंक पर आपकी ऎसी बेइज़्ज़ती नही होती"। उसने मेरी तरफ़ देखा और बोला की "आगे से खयाल रखूगीं"।
ये किस्सा आज से दो साल पहले मई महीने के आखिरी हफ़ते का है। इसके बाद मैनें एक काम शुरु कर दिया कुछ लोगो को ये काम कुछ अटपटा लगता है लेकीन मै इसको करता हुं वो ये की जब भी गाडी पर चलते वक्त कोई लडकी मुझे ऐसी हालत मे मिलती की उसकी जीन्स काफ़ी नीचे हो तो मै उस लडकी ये चलती गाडी पर इशारे से कह देता हु की अपनी टी-शर्ट नीचे कर लो। ये मेरी तरफ़ से एक कोशिश है की कोई और लडकी ऐसी हालात मे न पडें। लेकिन ये घटनायें तो रोज़ की बात हो गयी है।
रतें और लडकियौं के ब्लाउज़, कमीज़, और टी-शर्ट का गला इतना बडा होता है वक्षस्थ्ल का काफ़ी हिस्सा दिख रहा होता है लेकिन जब दिखते ज़िस्म को गौर से देखो तो छोटे कपडें को खिचं कर बडा करने की कोशिश करती है ऐसा क्यौं? जब शर्म आती है तो ऐसा कपडा पहनते ही क्यौं हो? क्या घर से निकलते वक्त पता नही था की क्या दिख रहा है और क्या नही? अगर दिखाने का शौक है तो अच्छी तरह दिखाओ ताकि आपको उस पर टिप्पणी या किसी महानुभाव के सदुपदेश मिलें और आपकॊ अपनी कमी और खुबी का पता लगें।
क नया शौक और चला है बगैर अंत्रवस्त्र के टी-शर्ट और सलवार कमीज़ पहनना और हम सब जानते है जिस्म के ऊपरी भाग मे अंत्रवस्त्र न पहनने पर दुनिया की कोई ताकत इस चीज़ को छुपा नही सकती है और ये सबसे ज़्यादा नयी उम्र की लडकियौं मे है जिन्होने अभी - अभी जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा है और उनके वक्षस्थ्ल मे अच्छा खासा बदलाव हो चुका है।
अब आप लोग मुझे अपनी राय दे की ये सब क्या है? शालीनता? फ़ैशन? अश्र्लिल्ता? या फ़ुहडपन

28 टिप्‍पणियां:

  1. बंधु आपने अपने लेख में लड़कियों के पहनावे का उल्लेख तो बेहद गरमा-गरम किया है लेकिन क्या कभी आपने सोचा है जो आप या आप जैसे और पहनते हैं वो कितना शालीन या असभ्य होता है। अगर कोई लड़की अपने कुर्ती, शर्ट या टॉप के नीचे कुछ नहीं भी पहनती है तो आप कौन होते हैं उस पर ऐतराज जताने वाले? यह उसकी मर्जी है।
    जो कुछ आप पहने वो सब ठीक मगर अगर लड़की पहन ले तो सब गलत और संस्कृति के खिलाफ। निवेदन है कि आप अपनी बंद सोच को थोड़ा खोलें।

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  2. अंशुमाली थैंक्स आपने कह दिया जो मै कहना
    आयी थी . कुछ लोग संस्कारो के बहाने पॉर्न
    परोसते हैं और ये आलेख भी वैसा ही लगा . कितना
    खूबसूरती से आप ने लड़कियों के बारे मै इतना
    विस्तृत लेख लिख दिया . आप के पास
    बहुत समय हैं लड़कियों के परिधानों के अंदर
    झाकने के लिये , लगे रहे
    मौसम बदल रहा हैं ग्लोबल वार्मिंग से सब
    परेशान सो ऐसे मै अगर बच्चियां जींस या कोई
    भी comfortable परिधान पहनती हैं तो इसमे
    गलत क्या हैं . वैसे कभी पुरुषों के बदलते
    फैशन पर भी एक धांसू पहासू लेख हो जाये
    नंबर , साईज और ब्रांड के साथ

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  3. रस्तोगी जी,

    आप मेरे ब्लोग पर आये और अपनी बहुमुल्य टिप्पणी दी उसका बहुत शुक्रिया। लेकिन मैं एक बात कहना चाहुंगा आपने कहा लडकी क्या पहने और क्या नही वो उसकी मर्ज़ी तो फिर सडक पे चलने वाले लडके का भी कोई दोष नही है क्यौंकी उसकी भी मर्ज़ी है वो रास्ते मे मौजुद या दिखने वाली चीज़ पर अपनी राय ज़ाहिर करें।

    मैं ये नही कहता की छेडने वाले सिर्फ़ इस तरह के कपडें पहनने वाली लडकी को ही छेडते है लेकीन छेडे जाने वाली लडकीयौं मे इनका प्रतिशत बहुत ज़्यादा होता है।

    मेरी बात पर गौर कीजियेगा, चाहें तो अपने घर पर मौजुद महिलाओं से इस बात पर राय ले सकते हैं

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  4. रास्ते मे मौजुद या दिखने वाली चीज़

    ladki ko aap cheez samjhtey haen yahii aapki maansiktaa ko darshane kae liyae kaafi haen

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  5. रास्ते मे मौजुद या दिखने वाली चीज़
    waah kyaa mansiktaa haen ladki ko cheez samjhtey haen

    उत्तर देंहटाएं
  6. my dear arif,
    thank ki aapne "bhadaas" par mere lekh 'dress code: galat ya sahi" par apne comments diye. aapka lekh bhi padha... samajh nahi aa raha ki aapko kya kahun? sach maniye aapne to mere shabdo ko bemani kar diya. apne lekh mein maine baat ashlilata ki nahi ki thi. maine baat dress code ki kahi thi. main ab bhi maanta hun har vidyalao, sikchhan sansthano ke sath sath, har office aur working areas mein bhi dress code hona chahiye... isse kisi v sansthan ki pahchaan badhti hai... par aapne to mere lekh ko padhne ke baad ladkiyon ke kapdo par pura research hi kar dala... dear main ladkiyon ke kisi v pahnave ke virudh nahi hun, main sirf dress code ke pakchh mein hun... khair apni apni sonch...

    And dear rachna ji... aapka gussa behad jayaj hai... main aapke baaton se agree hun... ladkiyaan koi cheej nahi hai...

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  7. काशिफ़ जी आपने बहुत ही अच्छा लेख लिखा है और ये जितने भी टिप्पणीवीर लोग हैं उनके मुंह पर तमाचा मारा है। दरअसल ये सब अगर किसी और लड़्की के साथ हो तो इन्हें कोई समस्या नहीं है मगर अगर इनके खुद के घर की औरतों के साथ सिग्नल वाला वाक्या होगा तो इन सबकी सोच एकदम आपके जैसी हो जायेगी।

    अरे स्वतंत्रता चाहिये तो पूरी ले लीजिये और अगर फ़ूहड़ कपड़े पहनना, सिगरेट पीना, बीयर पीना स्वतंत्रता है तो ऐसी स्वतंत्रता आपको ही मुबारक हो।

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  8. आप लोग मेरे ब्लोग पर आये और अपनी बहुमुल्य टिप्पणीयां दी आप सबका बहुत - बहुत शुक्रिया।

    @ रचना जी, मुझे लगता है शायद बहुत भावुक हो गयीं इस लेख को पढकर, शायद आपकी मैनें आपकी दुखती रग पर हाथ रख दिया तो आपके इतना दर्द हुआ की आपने मेरे लेख को समझे बगैर टिप्पणी कर दी।

    पहली बात आपकी भाषा में आपको बताता हु जो नज़ारा रोड पर आम होता है वो मैनें सबसें शालीन शब्दों का प्रयोग कर सबके सामने रखा तो वो पोर्न कह दिया तो जो लडकियां और औरतें ऐसे कपडें पहन कर सडकं और बाज़ारॊं मे घुमती है उनकों आप क्या कहेंगी?

    ज़रा ये भी बता दीजिये

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  9. @ रचना जी, दुसरी बात आपने मेरे लेख को ठीक से नही पढा अगर पढा होता तो ऐसी टिप्पणी नही करती।

    मैनें जीन्स के बारे मे लिखने से पहले ही ये लिखा था ज़रा गौर से पढियेगा.....

    "मुझे जीन्स से परेशानी नही है मुझे परेशानी है चुस्त और नाभि से नीचे खिसकती जीन्स से जिसमें बेल्ट नही बंधी होती है उसमें से झांकते अंत्रवस्त्र और साथ मे नीचे की ओर जाती बैकलाईन जो दो-तीन ईंच से लेकर पांच ईंच तक दिखती है और टी- शर्ट इतनी छोटी होती है की वो कमर और पेट को तो ढंक नही सकती"

    तीसरी बात आपने मुझ पर कितनी खुबसुरती से इल्ज़ाम लगा दिया

    कितना खूबसूरती से आप ने लड़कियों के बारे मै इतना विस्तृत लेख लिख दिया . आप के पास
    बहुत समय हैं लड़कियों के परिधानों के अंदर झाकने के लिये , लगे रहे

    आपने उस लडके पर इल्ज़ाम लगाया जो वो काम करता है जिस काम को मेरे साथी पागलपन कहते है

    इसके बाद मैनें एक काम शुरु कर दिया कुछ लोगो को ये काम कुछ अटपटा लगता है लेकीन मै इसको करता हुं वो ये की जब भी गाडी पर चलते वक्त कोई लडकी मुझे ऐसी हालत मे मिलती की उसकी जीन्स काफ़ी नीचे हो तो मै उस लडकी ये चलती गाडी पर इशारे से कह देता हु की अपनी टी-शर्ट नीचे कर लो। ये मेरी तरफ़ से एक कोशिश है की कोई और लडकी ऐसी हालात मे न पडें

    अब ज़रा इस लेख को पढें और दुबारा से टिप्पणी करें......

    आपकी अगली टिप्पणी का इंतेज़ार रहेगा

    उत्तर देंहटाएं
  10. @ अभिषेक जी, आपने मेरे लेख को ठीक से नही पढा....ज़रा एक बार दोबारा से पढ ले....

    पहली बात मैनें आपके लेख को आधार बनाकर ये लेख नही लिखा....बस आपके लेख से एक पुरानी बात याद आ गयी तो उस पर लेख लिख दिया...


    मैं भी ड्रेस कोड के हक मे हुं ये बात मैनें अपने लेख मे पहले ही कह दी है

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  11. फैशन के नाम पर समाज में सिर्फ अश्लीलता फैलाई जा रही है और कुछ नहीं.....हम लोग सिर्फ समान व्यवहार और अधिकारों की बात करना जानते हैं। ये नहीं जानते कि हमारे कुछ कर्तव्य भी होने चाहिए।

    खैर काशिफ जी, आपका लेख आपकी अच्छी सोच को दर्शाता है....

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  12. शालीनता और फूहड़ता में बहुत छोटा सा किन्तु बहुत बड़ा अंतर है..
    मेरा मतलब है की कोई पहनावा थोडा दुसरे तरीके से पहना जाए तो आसमान से धरती पर आ जाता है..

    मेरा भी एक दुखता घाव है...
    साड़ी के नीचे पहने जाने वाले ब्लाउस की तो हालत बिकनी टॉप जैसे हो गयी है...
    पहले के स्लीव-लेस तो भी ठीक थे... अब तो स्ट्रप ही नहीं बचे...
    और तो और साड़ी पहने का तरीका (प्रियंका चोपडा को देखें) तो क्या कहें!!!!!!!!
    साडी सही तरीक से पहनी जाए तो बहुत ही सुन्दर और शालीन होते हुए भी 'विषयक' (माफ़ करें) हो सकती है..
    किन्तु बिकनी ब्लाउस और सिकुड़ते और गिरते पल्लू के साथ नाभि के जितना नीचे हो सके उतना नीचे, पहनने से वो अश्लील ही रह जाती है..

    माना की छेड़-छाड़ तो सबसे होती है, पूर्ण रूपेण ढके हुयी महिलायों/लड़कियों से भी होती है .. उसमे 'दिखावे वाले' पहनावे के कारण थोड़ा ज्यादा संभावना है.. फिर भी छेड़-छाड़ हर हाल में निंदनीय है.

    ~जयंत

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  13. Mujhe dhotee pahan kar chalne waalon se bahut takleef hai.

    Us par we besharm log kapade kaa underwear pahan lete hain jisse unka jananang hilta dulta dikhta rahta hai.

    Unkee besharmee kee to had hee ho jaatee hai jab us dhotee ka ek chhod we haath me aise lekar ghoomate hain jaise we apnee taange dikha kar sabko bata rahe hon "dekho kitane sundar hain".

    Mujhe un ladakon se bhee takleef hai jo tight T pahan kar apne aap ko sabse sundar samajhte hain...

    ghinn aur gussa dono aataa hai ...kyaa karoon? unkee dhotee kheench kar kutte dauraoon?

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  14. आई, पढा और जा रही हूँ। कुछ कहूँगी तो आप कहेंगे कि मैं आपकी बात/लेख नहीं समझी या कि लेख दोबारा पढूँ। आप ऐसा क्यों लिखते हैं जो हम जैसे आम लोग (और विशेषकर स्त्रियाँ, जिन्हें आप बहुत कुछ समझाना चाहते हैं या समझाना अपना नैतिक कर्त्तव्य मानते हैं,)समझ न पाएँ? ऐसी भाषा में लिखें जिसे हम समझ पाएँ और एक बार पढने में ही समझ जाएँ।
    घुघूती बासूती

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  15. लड़कियां बिगड़ गई हैं, कपड़े जो भड़काऊ पहनती हैं। लड़के बिगड़ गए हैं, ये लड़कियों को छेड़ते हैं। एक तुम ही शरीफ बच गए। अपने मुंह मियां मिट्ठू तो न बनो यार।

    उत्तर देंहटाएं
  16. लड़कियां बिगड़ गई हैं, कपड़े जो भड़काऊ पहनती हैं। लड़के बिगड़ गए हैं, ये लड़कियों को छेड़ते हैं। एक तुम ही शरीफ बच गए। अपने मुंह मियां मिट्ठू तो न बनो यार।

    उत्तर देंहटाएं
  17. जिसे जो पहनना हो पहने अपने रिस्क पर -आखिर इसमें पाबंदी क्यों -सोच अपनी अपनी ख्याल अपना अपना !
    बुद्धिमान लोग श्रेष्ठ परम्पराओं का अनुसरण करते हैं ! मूर्ख अपनी खुद बनाते हैं और अज्ञात इतिहास बन जाते हैं !

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  18. आशिफ जी आपकी उम्र क्या होगी?

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  19. अरविंद जी,
    आप मेरे ब्लोग पर आये और अपने बहुमुल्य विचार रखें उसका बहुत बहुत शुक्रिया। देखिये मुझे कपडों से कोई परेशानी नही है मुझे परेशानी है कपडें पहनने के तरीके से, मुझे सही नही लगा मैने बोल दिया और मैं किसी से ज़्बरदस्ती करवा तो नही सकता...मै कह सकता हु और टोक सकता हु और वो मैने कर दिया।

    मेरा फ़र्ज़ पुरा हो गया आगे पहनने वाले की मर्ज़ी.....

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  20. @ कुश जी,
    सबसे पहले आप मेरे ब्लोग आये उसके लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया। दुसरी बात मेरा नाम "काशिफ़ आरिफ़" है।

    मेरी उम्र २३ साल है और इन्शाल्लाह अगर ज़िन्दगी सलामत रही तो आने वाली ३ अगस्त को २४ के हो जायेंगे।

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  21. भाई अपनी निगाह अंगवस्त्रों से हटायें तो कुछ साफ़ देख सकेंगे।
    हमारे कस्बे में भाई लो जांघिया पहनकर घूमते हैं और उस अंग्वस्त्र में तो हर अंग झलकता है पर हमने किसी महिला को आजतक उन्हें छेडते हुए नहीं देखा। दलित मोहल्ले में दो-ढाई हज़ार छोडिये छोडे हुए कपडों में महिलायें पूरा शरीर ढंके काम करती है और बाबू-बाबा लोग उन्हें भी नहीं छोडते…तो क्या तय होता है कपडों से?

    यह केवल उस मानसिकता का मामला है जिसमे स्त्री को भोग्या माना जाता है। बाज़ार ने देह को माल में तब्दील किया तो इसकी शिकार लडकियां कैसे नहीं होती? आप दोनो मज़े नहीं ले सकते कि बाज़ार को खोलते जाईये और महिलाओं को क़ैद कर दीजिये। परदे पर अश्लीलता और सडक पर लाजवंती देखने की यह हसरत हमारे मध्यवर्गीय दोगलेपन की पैदाईश है।

    और जींस तो अब भी चार-पांच सौ की मिल जाती है…हम तो वही पहनते हैं इसमें शर्म कैसी?

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  22. बचवा ,जो तुमने लिखा/कहा...इमानदारी से कहती हूँ...देश के कम से कम ३०-४०% या हो सकता है इससे अधिक भी हो यह प्रतिशत ....बिलकुल ऐसी ही सोच रखते हैं. हाँ इस मंच पर अधिकाँश यह स्वीकारने में झिझकते हैं,कि कोई उन्हें रूढिवादी,पुराने विचारों वाला ,आधुनिकता का विरोधी न समझे.

    समस्या यह है कि आज आधुनिकता के अंधी दौड़ में शामिल लड़किया/स्त्रियाँ जींस सलवार कमीज से लेकर साड़ी या किसी भी परिधान में शीलता और अश्लीलता में भेद को ध्यान में नहीं रख पातीं...फैसन का अर्थ जब फिल्मी नायिकाओं की नंग्नता का अन्धानुकरण हो तो फिर भेद करने का अधिक सामर्थ्य रख पाना सरल भी तो नहीं.

    औरतें अर्धनग्न रहें व्यसन में लिप्त रहें.... इसे प्रगतिशीलता, अपना अधिकार और पुरुषों के बराबरी का मामला बना दिया है कतिपय लोगों ने और यह काफी गहरे मन में बैठ चुकी है.......

    और ऐसे विश्वास को किसी भी हालत में ,कितना भी चिल्लाओ ,नहीं डिगा सकते.... नाहक अपनी फजीहत करवाओगे....

    एक आम स्त्री पुरुष का कंसर्न पश्चिमी परिधानों से नहीं बल्कि पहनावे ,व्यवहार तथा क्रिया कलाप में अपनाए गए अश्लीलता से है ,इस बात को प्रगतिशीलता तथा नारी अधिकारों के लिए आवश्यकता से अधिक सजग समाज न ही समझ पायेगा और न ही स्वीकार करेगा....

    सच कहूँ तो जिन नग्न्ताओं का तुमने अपने आलेख में वर्णन किया है...मैं भी अपने आस पास अक्सर देखती हूँ और बहुत ही दुखी होती हूँ कि स्त्रियों ने स्वयं ही अपने हाथों अपने को कितना नीचे गिरा दिया है,जिन्हें गरिमा नहीं ग्लैमर खींचती है अपनी ओर........

    सो मेरी सलाह है कि छोड़ ही दो इस विषय को..... जिन्हें भान है इस बात का....जो दिखने के आधार पर अपनी पहचान बनाने में नहीं बल्कि अपने महत कार्य के बल पर अपनी पहचान बनाने में विश्वास रखती हैं या बना रही हैं....ऐसा भी बहुत बड़ा समूह हमारे देश में ,हमारे समाज में मौजूद है और यह समूह अपने तरह से प्रगतिशीलता , नारी अधिकार तथा सफल सशक्त व्यक्तित्व की परिभाषा को सच्चे अर्थों में परिभाषित कर रही हैं.....

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  23. भाई जी आपके पास सड़क चलती लड़कियों और महिलाओं को देखने के सिवा और कोई काम नहीं है? वैसे आपकी उम्र में यह काम गलत भी नहीं कहा जा सकता. आयु का ही प्रभाव है. एक बात अवश्य है कि विवादास्पद मुद्दे को चुनकर आप काफ़ी बड़ संख्या में महिलाओं का ध्यान केन्द्रित करने में सफ़ल रहे. बधाई!
    अपने ब्लोग पर तो महिला तो क्या पुरुष भी नहीं आते, ब्लोगिंग जगत में भी मसाला डोसा ही पसन्द किया जाता है. सादा खाना कौन पसन्द करता है?

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  24. डाक्टर साह्ब.
    सबसे पहले आप मेरे ब्लोग पर आये और अपने बहुमुल्य विचार रखें उसका बहुत - बहुत शुक्रिया।

    मेरी उम्र २३ साल है और इन २३ सालों मे से पिछ्ले सात साल से मैं अपने पिताजी का कारोबार संभाल रहा हूं और इसके सिलसिले मे मुझे हफ़्ते मे चार दिन अपने शहर आगरा के बाहर गुज़ारने होते है। और बाकी तीन दिनों मे रोज़ सात से आठ घंटे मेरे मेरी बाईक पर गुज़रते है काम के सिलसिले में।

    मै यु. पी. और भारत के बीस शहरों की सभ्यता, रहन-सहन, पहनावा सबकुछ देख चुका हूं। मैं हमेशा जब भी कोई बात करता हूं तो पूरी जानकारी करने के बाद ही करता हूं उस जानकारी से जब तक मैं सन्तुष्ट नही होता तब तक मैं किसी के सामने उस विषय पर ज़्यादा बात नही करता।

    मैनें इन सात सालॊं में मैनें प्लेन, ट्रेन के ए.सी., स्लीपर, जनरल क्लास, बस, टांगा, ट्र्क, हर तरह से सफ़र कर चुका हूं और हर उम्र और हर तरह के लोगो से बात की है। इसमे औरतें, लडकियां, छात्र, पुरुष सब शामिल है। मेरी आदत है की मैं सफ़र मे कभी चुप नही बैठता और अपने सहयात्री से किसी न किसी विषय पर बात करता रह्ता हूं। तो मैनें जो कुछ भी लिखा है इसमे मेरा इतने दिनॊं का अनुभव और दुसरों लोगो के विचार और सोच शामिल है।

    उत्तर देंहटाएं
  25. रंजना जी,
    आप मेरे ब्लोग पर आयीं और अपनी बहुमुल्य राय दी उसका बहुत - बहुत शुक्रिया।

    मैं इस विषय पर लिखना चाहता था लेकिन अंदाज़ा था की इसका विवाद बन जायेगा तो नही लिख रहा था लेकिन उस दिन एक दिन मे पाचं पोस्ट इस सम्बंध मे पढ ली तो जो गुबार मेरे दिल था वो निकल गया। मैं औरत की इज़्ज़त करता हूं और मैं जानता हूं की मैनें जो लिखा है उसका एक - एक शब्द सच है।

    और रही बात रुढिवाद, पुराने विचार और आधुनिकता के विरोध की तो ऐसा कुछ नही मैं आधुनिकता का विरोधी नही.....मैं नग्नता का विरोधी हुं।

    ऐसे ही आते रहे और हौसला बढाते रहें

    उत्तर देंहटाएं
  26. अशोक जी,
    उन लोगो की बात मत कीजिये जिन के पास पहनने को कपडा नही है क्यौंकी उनके पास कोई दुसरा रास्ता नही हैं यहां बात हो रही है की जिन्के पास भगवान का दिया सबकुछ है और वो फिर भी अपने बदन को नही ढकं रहे हैं। मैं इस चीज़ के बारे मे बहुत अच्छी तरह जानता हूं क्यौंकी मैने ऐसे नज़ारे बहुत देखें हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  27. kya bakwas blogpost hai ye..
    waise aap ko to 1800 mai hona chahiye tha abhi kyu huye...
    aur ho gaye ho to fir ye bakwas baate mat kiya karo..ok..
    ok...and also I like ur other bolg posts..thanks dear..lage raho...
    but aise blog jo ki girl ke khilaf mat likho...
    waise tum man log woman ko ek itm hi mante ho na ki aise raho waise raho..wht hell this?
    we know how to live....ok

    उत्तर देंहटाएं

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काशिफ आरिफ

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