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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

नवरात्रों में देवी के भेंट चढें मेरे साथ २००-२५० लैंडलाईन कनेक्शन... 200-250 Landline Connection Was Destroyed On Navratra

(वैधानिक चेतावनी :- ये लेख मैं लिखता नही लेकिन सुरेश चिपलूनकर जी के एक लेख के वजह से मुझे ये लिखना पड रहा है। ये लेख कोई साम्प्रदायिक्ता बढाने वाला लेख नही है. मैं इस लेख के माध्यम से लोगों के दिमाग पर पडी मिट्टी हटाना चाहता हूं )

इस साल १९ सितम्बर से नवरात्रे शुरु हुऐ थे.....२१ सितम्बर हो ईद थी। मैं आगरा के नाई की मण्डी श्रेत्र में रहता हूं और नाई की मण्डी में बी.एस.एन.एल की फ़ोन लाईन आगरा फ़ोर्ट और बिजलीघर की तरफ़ से आती है। ये लाईन बिजलीघर से चल कर मंटोला होती हुई सदर भट्टी होती हुई सीधे नालबंद चौराहे को निकल जाती है।

हर साल तीसरे या चौथे नवरात्रे को सदरभटटी चौराहे के पास खोजा हवेली पर पंडाल लगाकर पुरा रास्ता बंद कर दिया जाता है और वहां देवी की पुजा की जाती है और आजतक किसी ने इस पर ऐतराज़ नही किया हालंकि इससे जुता कारीगरों और व्यापारियों को परेशानी होती उनको बहुत घुम कर हींग की मण्डी जाना पडता है लेकिन ये बात सिर्फ़ एक-दो दिन की होती है इसलिये कोई कुछ नही कहता है।


गुरुवार, 17 सितंबर 2009

मेरी जिन्दगी का मकसद दो वक्त की रोटी.... My life ambition two times food in a day

           मेरी ज़िन्दगी का मकसद "दो वक्त की रोटी"...... ये अलफ़ाज़ एक सात-आठ साल के बच्चे ने मुझसे कहे। कल मैं अपने भतीजे को स्कुल से ला रहा था तो सिग्नल एक सात-आठ साल का बच्चा मुझे भीख मागंने लगा ये सब पहले आगरा में नही होता था लेकिन पिछ्ले छ्ह-सात महीनों से यहां पर भी शुरु हो गया है। आमतौर पर मैं बच्चों, हट्टे-कट्टे और सही जिस्म वाले भिखारियों को भीख नही देता हूं...क्यौकि ये लोग मजबुर नही होते है ये भीख का कारोबार करते है और मैं उस लडके को काफ़ी वक्त से इस चौराहे पर देख रहा हूं वो मुझे रोज़ मिलता है लेकिन कल पहली बार उसने मुझसे भीख मांगी थी।

          मैने उसको मना कर दिया वो जाने लगा तो मेरे भतीजे उसे बुलाया "तुम्हारा नाम क्या है?" उसने जवाब दिया "मोनू"...  "कहां रहते हो?" उसने कहा "यहीं सडक पर"...."तुम्हारे मम्मी-पापा कहां है?" मेरे भतीजे ने उससे पुछा तो उसकी समझ में नही आया तो उसने दोबारा पुछा "तुम्हारे मां-बाप कहां है?" मेरे भतीजे और उसकी उम्र लगभग एक जैसी होगी....मैं अपने भतीजे का चेहरा देख रहा था कि ये छोटा बच्चा उससे कैसा सवाल कर रहा है.....उस लडके ने जवाब दिया :- "मां का पता नही बापू तो वहां शराब की दुकान पर बैठा है"

शनिवार, 23 मई 2009

यहि देश कै भैया का होई ॥ आओ हम....

ङाक्टरेट से सम्मानित , शिक्षामंत्री एस .एम पटेल है।
के.के.एन.एफ़ डिग्री उनकी ,उई खींच -खाँच नाइन्थ फ़ेल है॥
यहि देश कै भैया का होईआओ हम....
आफिस मा लागत छुट्टी है,सब देख रहे है क्रिकिटिया ।
बाबू औ अफसर दूनौ मिलि, जनता कै खड़ी करैं खटिया ॥
यहि देश कै भैया का होईआओ हम....
स्वीटर बुन रही मास्टरनी , लरिकउनी गप्पे मार रही।
मास्टरनी लरिकउनी मिलिकै,विद्या कै अरथी निकार रही॥
यहि देश कै भैया का होईआओ हम....
मास्टर जी कुर्सी पर सोवैं ,लरिकै खेले गुल्ली डंडा।
खुल गवा पोल पढ़ाई कै ,जब पहुंचे इस्पिट्टर पंडा॥
यहि देश कै भैया का होईआओ हम....
जब मिला नतीजा कै कारड़,लरिकउनेव कै फूटा भंडा ।
तब बप्पा किहिन धुनाई खूब,जब देखीं सब अंडै -अंडा ॥
यहि देश कै भैया का होईआओ हम....
दै रही वजीफा गवरमिन्ट औ,पूरी खीर खियावत है।
देखै पिक्चर ,फांकै पुकार ,सब लरिका मौज उडावत है॥
यहि देश कै भैया का होईआओ हम....

-मोहम्मद जमील शास्त्री

रविवार, 29 मार्च 2009

दिल को हिला देने वाले नजारे !!!

बात आज से ३ दिन पहले की है मैं कानपुर स्टेशन के प्लेटफोर्म नम्बर सात पर अपनी ट्रेन अवध एक्सप्रेस का इंतज़ार कर रहा था, जो की एक घंटे लेट थी, तो प्लेटफोर्म नम्बर सात पर पुष्पक एक्सप्रेस आ कर रूकती है, जो लखनऊ से बांद्रा के लिए चलती है, मैं जहाँ खड़ा था उसके सामने ट्रेन की रसोई (Pantry Car) थी, कुछ देर खड़े होने के बाद ट्रेन चली गई तभी मेरी नज़र रेल पटरी के बीच मे पड़ी जहाँ पानी की पाइप लाइन पर एक आदमी बैठा था, और वो ट्रेन की रसोई मे से फेंकी गई जूठी प्लेटो मे खाना बीन कर खा रहा था, उसके पास चार आवारा कुत्ते घूम रहे थे वो भी उन्ही प्लेटो मे से खाने की तलाश मे थे.....उस आदमी के बाएँ हाथ मे एक लकड़ी थी जिससे वो उन कुत्तो दूर भगा रहा था और दायें हाथ से जल्दी जल्दी खाना उठा कर खा रहा था, कुत्ते भी काफ़ी भूखे थे, वो भी हर तरीके से कोशिश कर रहे थे की उन्हें कुछ खाने को मिल जाए.....मैंने अपनी ज़िन्दगी मे पहली बार इंसान और जानवर को खाने के लिए लड़ते देखा था।

शुक्रवार को मैं अपने एक व्यपारी को बरेली की ट्रेन मे बिठाने के लिए आगरा फोर्ट स्टेशन गया, ट्रेन आधा घंटा लेट थी तो हम लोग वहीं बैठ गए हम आपस मे बातचीत कर रहे थे....वहां कुछ गाँव वाले भी जिन्हें रास्ते मे कहीं उतरना था साडे सात बज चुके थे उन्होंने अपना झोला खोला और वहीं ज़मीन पर बैठ कर खाना खाने लगे वो चार लोग थे एक के पास सूखे आलू की सब्जी थी, एक पास पता नही क्या था मुझे दिखा नही तभी ऊपर बैठे बन्दर की निगाह उन पर पड़ गई वो नीचे उतर आया उसको देख कर उन लोगो मे से एक आदमी ने "जय हनुमान" कह कर एक रोटी झोले से निकाल कर बन्दर के सामने डाल दी, बन्दर ने उस रोटी को उठा कर सुंघा, और फिर छोड़ कर चला गया, तो मेरे साथ मौजूद लोगो ने और मैंने एक साथ कहा की "जिस रोटी को इंसान खा रहा है उसको जानवर ने खाने से मना कर दिया" उन लोगो ने एक बार फिर कोशिश की, दूसरी रोटी निकाल कर उसके सामने डाली लेकिन उसने तो क्या किसी दुसरे बन्दर ने भी उन रोटियों को हाथ नही लगाया.....

हम लोग बड़े फख्र से कहते है की हमारा भारत तरक्की कर रहा है, हम लोग अमीर होते जा रहे हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं है । "जो लोग पहले से अमीर है उनके खजाने बढते जा रहे है और जो गरीब है वो और गरीब होता जा रहा है,"

हमारा देश तरक्की कर रहा है लेकिन सिर्फ़ उच्च और मध्यम वर्ग की आय बढ़ रही है, और जो निम्न वर्ग का आदमी हैं वो तो सिर्फ़ दो वक्त की दाल रोटी, कपड़े की लड़ाई मे ही मरे जा रहा है.........इस क्रान्ति ने अमीर और गरीब के बीच की खाई तो इतना बढ़ा दिया है की उसको भरने मे हमारी पुश्ते लग जायेंगी..... ऊपर मैंने अपने आंखों से देखे हमारे हिन्दुस्तान के हालत बताये की यहाँ किसी को झूठा खाना खाने के लिए कुत्तो से लड़ना पड़ता है, और जिसको रोटी मयस्सर है वो रोटी जानवर भी खाने से मना कर देता है ।

"हिन्दुस्तानियौं को यह तरक्की बहुत मुबारक हो "

शनिवार, 16 अगस्त 2008

तिरंगे का अपमान !!!!!

सबसे पहले सब हिन्दुस्तानियों को ६१वे स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाये !!!! आप सभी को आज़ादी का यह दिन बहुत -बहुत मुबारक हो......


आप लोग यह सोच रहे होंगे की मैं स्वतंत्रता दिवस की मुबारक बाद आज क्योँ दे रहा हूँ वो तो कल था?????


मैं बताता हूँ क्योँ.......... क्यूंकि कल पुरे दिन मैं अपने शहर आगरा के स्कुलो - और सडको के दौरे पर निकला था । और मुझे जिस चीज़ का अंदेशा था उससे भी बुरा मुझे देखने को मिला और वो था हमारे तिरंगे का अपमान !!



सुबह जिस तिरंगे को हम अपने सर पर बिठा रहे थे, सीने से लगा रहे थे, उसे चूम रहे थे.....दोपहर को वही तिरंगा ज़मीन पर पड़ा हुआ था...कहीं पर कीचड में था, कहीं पर पानी में पड़ा था, कही बीच सड़क पर पड़ा था, लेकिन किसी भी शख्स को फुर्सत नही थी की तिरंगे की इस हालत पर गौर करता.....

कल १५ अगस्त को मैंने आगरा की सडको से तक़रीबन ३२ से ३५ तिरंगे समेटे हैं....और इतनी बुरी हालत में थे की मेरी आँखें नम हो गई.......कुछ ज़मीन पर मिटटी में पड़े हुए थे, कुछ कीचड में पड़े हुए थे, कुछ तो सड़क के बीच में पड़े थे और उनके ऊपर से लोग अपनी गाडियाँ लेकर निकल रहे थे लेकिन किसी में इतनी भी फुर्सत नही थी की वो उस तिरंगे को ज़मीन से उठा कर एक तरफ़ ही रख देते....

हम लोग इतने बेहिस हो चुके की जिस तिरंगे को सुबह फिराने के बाद सलामी देते है, सब को लड्डू खिलाते है, फिर हम भूल जाते हैं की यह हमारे देश की इज्ज़त है, उसके ज़मीन पर पड़े होने के बावजूद हम उसके ऊपर से गाड़ी निकाल लेते है, लेकिन उसको ज़मीन से नही उठाते है...

जितने भी तिरंगे ज़मीन पर पड़े थे उसमे से ज्यादातर वो तिरंगे थे जो बच्चे स्कूल ले जाते है, बच्चो का क्या है वो तो बहुत चंचल मन के होते है उनको इस चीज़ का एहसास नही होता है की किस चीज़ की कितनी एहमियत है.....ज़िम्मेदारी तो उन माँ - बाप और टीचरों की बनती है जो बच्चो के हाथ में तिरंगा देते है, उन्हें तिरंगा देने से पहले उन्हें उसकी एहमियत बतानी चाहिए ताकि बच्चे कोई गलती न करे....यह हमारी ज़िम्मेदारी है हम अपने बच्चो को समझाए, उनमे देशभक्ति का जज्बा भरे...

हम कितने बेहिस हो चुके है इसका एक उदाहरण मैं आपको बताता हूँ......

आगरा में st। Johns College से आगे बढ़ने पर मुझे एक तिरंगा सड़क के बीच में पड़ा दिखा, मैंने अपनी गाड़ी साइड से खड़ी की और रोड के बीच में पड़े तिरंगे को उठाने के लिए आगे बड़ा तो ट्रैफिक उस वक्त चालू था इसलिए गाडियाँ भी उस वक्त गुज़र रहीं थी, मैं जब सड़क को पार करता हुआ तिरंगे के पास पंहुचा तो एक कारवाले ने बिल्कुल में पास लाकर गाड़ी रोकी........और गाली बक कर बोला "क्या मरना चाहता है?" मैंने कहा -: "भाई साहब, तिरंगा उठाने आया हूँ. तो वो बोला, -: तू कुछ भी करने आया हो मुझे कोई मतलब नही है, अब रास्ता दे चल.

उस वक्त मुझे इतनी तकलीफ हुई की मैं शब्दों में बयान नही कर सकता हूँ की कितना ज़्यादा हम बेहिस हो चुके है हम। अपने स्कुल और कॉलेज के दिनों में हम तिरंगे को सीने से लगा कर रखते थे, और यहाँ पर लोग उसको अपने जूतों तले कुचल रहे हैं....

मुझे तो इस वक्त एक ही शेर याद आ रहा है जो मेरा मनपसंद है...

अभी भी वक्त है जाग जाओ ऐ हिन्दुस्तान वालो
वरना मीट जाओगे तुम्हारी दास्तां भी न होगी, दास्तानों में।

जय हिंद ।
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