शुक्रवार, 6 मार्च 2009

साठ साल से मुसलमान हमें "कैंसर" दे रहे हैं?...!!!!!

पिछले साठ साल से मुसलमान हमें कैंसर दे रहे हैं....उसका क्या करें? यह अल्फाज़ एक ७५ वर्षीय व्यक्ति के हैं जो उसने मुझसे कहे थे, यह बात तब की हैं जब मैं हमेशा की तरह अपने काम के सिलसिले मे टूर पर गया हुआ था मेरा बुधवार को कानपूर स्टेशन से टूंडला तक संगम एक्सप्रेस मे रिज़र्वेशन था, मेरे साथ मेरे पिताजी थे....गाड़ी एक घंटा लेट थी, दस बजकर बीस मिनट पर गाड़ी आई, हमारी बर्थ एस २ मे ५१, ५२ थी, जब हम बोगी मे पहुचे तो देखा उसमे ७२ नही ८४ बात थी, तो लाज़मी था सबके बर्थ नम्बर बदलने थे क्यूंकि टिकट पर नम्बर ७२ के हिसाब से लिखे थे.....मैं बाहर गया तो रिज़र्वेशन चार्ट फटे हुए थे हमेशा की तरह, तो मैंने वहां लगी टच स्क्रीन कंप्यूटर से अपना बर्थ नम्बर निकाल लिया जो की ५७, ५८ था, अब अपनी बर्थ पर saaman रख कर मैं बाथरूम गया, वहां से आने के बाद मैंने देखा की मेरी बर्थ की सामने वाली साइड बर्थ पर एक बुजुर्ग आदमी जिनकी उम्र लगभग ७५ से ७८ साल होगी, गोरा रंग, एकहरा बदन, वो बर्थ पर लेटे हुए बीढ़ी पी रहे थे, मुझे बीढ़ी - सिगरेट के धुंए से घुटन होती है, मैंने उनसे कहा अंकल जी, आप बीढ़ी बुझा दो या फिर दरवाज़े पर खड़े हो कर पी लीजिये, तो उन्होंने कहा की मैं दो कश लेकर बुझा रहा हूँ। उन्होंने दो कश लिए लेकिन उन दो कश मे पुरी बीढ़ी ख़तम कर दी, मैंने उनसे कहा "अंकल, क्योँ आप अपने अंदर बरसो से पल रही बीमारी को लोगो दे रहे हो," तो उन्होंने कहा की "तुम लोग हमें साठ साल से जो बीमारी दे रहे हो उसका क्या?" मेरी समझ मे कुछ नही आया, मैंने उनसे दोबारा पूछा "कौन सी बीमारी, कौन लोग दे रहे हैं?" तो उन्होंने कहा की "तुम, तुम मुसलमान हमें साठ साल से कैंसर दे रहे हो, उसका हम क्या करें?" यह सुनने के बाद मैं दो - तीन मिनट तक कुछ बोल नही सका, मैंने सुना था की कई बार मुसलमानों से कुछ लोग ऐसा सौतेला व्यवहार कर जाते हैं, लेकिन उन लोगो की बातों को मैंने कभी सीरियसली नही लिया लेकिन उनके मुहँ से यह सुनने बाद मुझे उन लोगो की बातों पर यकीन हो गया, मैं समझता था की ऐसी बातें सिर्फ़ सियासत से जुड़े लोग ही करते हैं, आम आदमी कभी नही करता लेकिन उन्होंने मेरी समझ को झूठा साबित कर दिया।
इतने मे मेरी पिताजी जो बाथरूम गए हुए थे वो वापस आ गए, उनके इतना कहने के बाद वहां पर जो लोग भी मौजूद थे उन सबने उन अंकल से बोला की क्या बेकार की बात कर रहे हो? इसमे हिंदू - मुस्लिम की बात कहाँ से आ गई? उस बच्चे ने सिर्फ़ इतना ही कहा था की बीढ़ी बुझा दो, ग़लत तो नही कहा था, तुम ट्रेन मे बीढ़ी पी रहे जो की कानूनन जुर्म है....पिताजी ने जब हंगामा होते देखा तो उन्होंने पूछा की क्या हुआ? मैंने उन्हें थोडी बहुत बात बता दी लेकिन मैंने उन्हें यह नही बताया की उन्होंने मुझसे क्या कहा था, उसके बाद भी वो पिताजी से लड़ने लगे, वो तो मारपीट करने की लिए अपनी बर्थ से उतर कर आ गए थे, लेकिन वहां मौजूद लोगो ने बीच बचाव करा दिया, बात खतम हो गई, लेकिन यह बात मेरे लिए ख़तम नही हुई थी मैं पुरी रात अपनी बर्थ पर लेटा सोचता रहा, नींद मेरी आंखों से कोसो दूर रह - रह कर कानो मे वो आवाज़ गूंज रही थी, उनकी आवाज़ मे जो कड़वाहट थी वो भुलाए नही भूलती है, उनकी आंखों मे मुझे बहुत नफरत दिखाई दी थी, मुसलमानों के लिए......

पुरी रात सोचते - सोचते निकल गई, मेरे दिल मे बहुत सारे सवाल आ रहे है, जिनके जवाब तलाशने हैं:-

क्या मुसलमान भारतवासी नही है?

क्या मुसलमानों को हिन्दुस्तान मे रहने का हक़ नही हैं?

क्या हिन्दुस्तान मुसलमानों का मुल्क नही है?

क्या यह देश सिर्फ़ हिन्दुओं का है?

क्या जो लोग आज़ादी से पहले से यहाँ रहते आ रहे हैं, और जिनके पुरखो ने आज़ादी की ज़ंग मे हिस्सा लिया वो यहाँ रहने के लायक नही हैं?

क्या कुछ मुसलमानों का अपने लिए अलग ज़मीन माँगना, सारे मुसलमानों के लिए इतना भारी पड़ेगा की उनके
मुल्क मे उन्हें पराया माना जाए?

क्या कुछ लोगो की ग़लत हरकतों की सज़ा पुरी कौम्म को देना सही है?

क्या आपको पता है जब किसी आदमी को लोग शक की नजरो से देखते है कितनी तकलीफ होती है?

क्या आपको पता है जब स्टेशन पर पुलिस वाला सब को छोड़ कर आपसे पूछताछ करता है तो कैसा लगता है?

तब आपको कैसा लगेगा जब कमरा किराये पर देने से पहले आपका धर्म पुछा जाता है?

क्या कभी किसी आम मुसलमान की ज़िन्दगी को आपने गौर से देखा है? कभी देखियेगा, वो सुबह उठेगा, नमाज़ पड़ेगा, और रोजाना के काम करने के बाद अपने काम पर निकल जाएगा, शाम को फिर वापस घर। एक आम हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिख या किसी धर्म या जाती का हो, इन सब आम आदमियों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मे सिर्फ़ एक फर्क हैं वो हैं अपने इश्वर को याद करने का तरीका, उसकी पूजा करने का तरीका, बस इसके अलावा सब कुछ एक सा है।

मेरी बात को ज़रा अकेले मे बैठ कर sochiयेगा, क्या यह जो हम लोग एक धर्म के लोगो के साथ कर रहे हैं, क्या वो सही है?

9 टिप्‍पणियां:

  1. ye kalpana hi mere lie qable nafrat hai ki koi paidaisi taur par hidu aur muslim kaise ho sakta hai ?

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  2. नालायक व्यक्ति, उसको एक थापड़ पड़ना चाहिये. ऐसे गदहों, बेवकूफों की वजह से ही अपने देश कि हालत सही नहीं.

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  3. अच्‍छा लिखा आपने, हर लाइन में हमारा दर्द है, यह लोग रहमान के आस्‍कर इनाम लाने पर खुश तो हो रहे हैं, लेकिन यह नहीं जानना चाहते रहमान ने इस्‍लाम धर्म ही क्‍यूं अपनाया था, देखें islamicwebdunia dot com मुसलमान बुराई फैलाते नहीं दूर करते हैं,
    उमर कैरानवी

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  4. kashif आप की तकलीफ का मुझे अंदाजा है लेकिन आप एक बात बताइये कि आप उस एक आदमी की बात का बुरा मानकर उदास होगये और उन लोगो का क्या जिन्होने आपका साथ दिया। क्या आपको इस बात की खुशी नहीं है कि बाकि लोगो ने आपका साथ दिया और उस आदमी के खिलाफ रहे।
    मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि अच्छी बातों को याद करके खुशी मिलती है और बूरी और गलत बातों को याद करके दर्द ही मिलता है तो क्यों न सिर्फ अच्छी यादों को गले लगा कर जिया जाये बाकि बुरा ख्वाब समझ कर भूला दिया जाये।

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  5. सब तरह के लोग सब जगह होते हैं। व्‍यक्तिगत स्‍तर पर मैं आपकी पीडा में आपके साथ हूं। किन्‍तु एक बात याद रखिए। सवाल हिन्‍दू या मुसलमान का नहीं है। जिस भी धर्म के लोग, अपने धर्मावलम्बियों की धर्मान्‍ध और अनुचित हरकतों पर चुप रहते हैं तो इस चुप्‍पी की सजा पूरी कौम को भुगतनी पडती है।
    मैं हिन्‍दू हूं और हिन्‍दू धर्म के नाम पर अनुचित हरकतें करने वालों का विरोध उनके मुंह पर ही करता हूं। ऐसा करके मैं खुद के सिवाय किसी और पर उपकार नहीं करता। यह तो मेरी जिम्‍मेदारी है। मेरे धर्म की, मेरी कौम की सार्वजनिक छवि बेदाग बनी रहे इसके लिए मुझे तो चौबीसों घण्‍टे चौकन्‍ना और सक्रिय बना रहना पडता है।
    आपकी पीडा से असहमत होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। आपकी पीडा, हम सबका, इस देश का दुर्भाग्‍य है।

    एक निवदेन। आपका ब्‍लाग पढने में बहुत ही कठिनाई हुई। इसका रंग संयोजन आंखों मे चुभता है।

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  6. भाइ। वो आदमी सिर्फ़ मुसलमानों से नहिं पर अपनी जिंदगी से हारा हुआ होगा। और बिच में आप आ गये। वरना इस उम्र में उसके साथ क्या उसका बेटा-बेटी या बीवी नहिं होते? शायद वो भी एसे पागल को छोड कर चले गये होंगे।

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  7. मैं तुम्हारी इस तकलीफ़ को समझ सकती हूं...!!!!

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काशिफ आरिफ

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