मंगलवार, 7 जुलाई 2009

सुख रहा है हिन्दुस्तान का दिल..!!


हमारे "हिन्दुस्तान का दिल" यानी "मध्यप्रदेश" . ये राज्य हमारे देश के बीच मे स्थित है और अपने हैन्डीक्राफ़्ट मतलब हाथ की कारीगरी के लिये बहुत मशहुर है। आजकल वहां के हालात बहुत खराब है पीने के लिये पानी नही है। पानी जिसके बिना कुछ भी नही है वो वहां उपलब्ध नही है...हाहाकार मचा हुआ है..

अभी १३ मई को भोपाल मे एक घर मे मां, बाप और भाई मारे गये है टुटी हुई पाइप लाइन से पानी भरने की लडाई मे। अब तक पुरे मध्य प्रदेश मे मई के महीने मे ही ५० से ज़्यादा मारपीट की घटनायें हो चुकी है। हालात दिन ब दिन खराब होते जा रहे है। इस प्रदेश के कई शहरों मे दस - दस दिन पानी नही आता है। एक एक करके सारी नहरे, तालाब, नदियां सब सुखते जा रहे है....अब तक पुरे मध्य प्रदेश मे कुल मिलाकर १० - १५ तालाब पुरी तरह सुख चुके है और जो बचे है वो इस लायक नही बचे है की उन्का पानी पीने के काम मे लिया जाये। अकेले भोपाल मे छोटे-बडें मिलाकर १० तालाब और झीलें है लेकिन अब किसी मे भी पानी नही है। मध्यप्रदेश मे तो दो - तीन शहर तो ऐसे है जो तालाब और झील की वजह से बसे है लेकिन उन शहरों मे आज सब कुछ है सिवाय उन तालाब और झीलों के।







मध्य प्रदेश की लाइफ़ लाइन नर्मदा नदी जिससे मध्य प्रदेश की पानी की आधे से ज़्यादा ज़रुरत पुरी होती है। जिसके लिये लोगो के दिल मे बहुत आस्था है उसका आकार दिन ब दिन सिकुडता जा रहा है इस नदी का हाल भी हमारे देश की दुसरी नदियो की तरह होता जा रहा है जिनके अन्दर सिर्फ़ कीचड, केमीकल, और मरी हुई मछलियों के अलावा कुछ भी नही है। जिन लोगो के मन मे इन नदियों के लिये आस्था है इनकी बर्बादी के ज़िम्मेदार भी वही लोग है जो ज़रुरत पडने पर ही इन नदियों की तरफ़ देखते है और फ़िर इन्हे भुल जाते है। न खुद कुछ करते है और ना गलत करने वाले को रोकते है। टोकने पर कहते है की ये तो सरकार की ज़िम्मेदारी है मानता हुं की सरकार की ज़िम्मेदारी है लेकिन इन नदियों का इस्तेमाल कौन करता है? जब हम लोग इस्तेमाल करते है तो हमारी कोई ज़िम्मेदारी नही बनती है? मैं ये नही कह रहा की जाओ और खुद सफ़ाई करो या जो नदी को गंदा कर रहे है उनसे लडों लेकिन कम से कम हम सरकार का ध्यान तो इस तरफ़ दिला सकते है और थोडे - थोडे दिनो बाद उनसे सवाल करते रहें की आप लोग क्या कर रहे है।

और भुजल का तो बहुत बुरा हाल है महोबा, देवास, रेह्ती, मालवा, जैसे बहुत से इलाके है जहां पर भुजल स्तर बहुत नीचे चला गया है कहीं पर ४५० फ़ीट, कहीं ५०० फ़ीट, और तो और कुछ इलाको मे ६५० फ़ीट पर भी पानी नही है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल जो एक बहुत बडा शहर है और काफ़ी खुबसुरत है। भोपाल मे कभी छोटे-बडे १० तालाब और झीले थी अब उनमें से कुछ ही बची है। भुजल स्तर दिन ब दिन नीचे जाता जा रहा है कुछ इलाको मे ६०० फ़ीट पर भी पानी नही है।भोपाल अब कंक्रीट का जंगल बन चुका है ना वहां तालाब बचे है और ना ही पेड इस वजह से बारिश भी बहुत कम हो गयी है। ये तालाब और झीलों, ज़मीन और बारिश से भी पानी आया तो कहां गया इतना पानी? किसने इस्तेमाल किया? किसने बर्बाद किया? कौन है इसका ज़िम्मेदार? किसकी गलती है?


हमारी गलती है हमने पानी को अपनी जागीर समझा, जब हम एक बाल्टी से नहा सकते थे तो हमने शावर और बाथटब का इस्तेमाल किया, हमने शेव करते, बर्श करते वक्त नल को खुला छोडा जबकी उसकी ज़रुरत नही थी। जिनके घर मे पानी आता है या फिर उनके घर मे सम्रसीबिल पम्प या मोटर लगी है वो अपने घर को पाइप से धोते है घर के अलावा सडक को भी धोते है। आप धोयें मै धोने को मना नही कर रहा हुं लेकिन जो काम ३०-४० लीटर पानी से हो सकता है उसके लिये १५० लीटर पानी बहाने का क्या मतलब है।

ज़्यादातर शहरों मे पुरे - पुरे महीने पानी नही आ रहा है लोग पुरी - पुरी रात जाग रहे है पानी के इन्तेज़ार में। जिन शहरो मे पानी नही है वहां नगर निगम के लोग टैंकर से पानी सप्लाई कर रहे है जब ये टैंकर सडक से गुज़रता है तो लोग इसके पीछे भागते है। हमेशा लडाई होती है क्यौंकी हर आदमी पहले पानी भरना चाहता है अब हर टैंकर के साथ एक पुलिसवाला लगाया जाता है लेकिन वो भी लोगो को काबु मे नही रख पाता है।




मध्य प्रदेश मे इन दो - तीन मे अब तक १०-१२ लोग मौत के मुहं मे जा चुके है पानी की लडाइयों में और कई सौ घायल हो चुके है। हालात बहुत खराब है और दिन ब दिन खराब होते जा रहे है। हमारे देश के एक प्रदेश मे जलयुद्ध शुरु हो चुका है और अब देखना ये है की इस जलयुद्ध को हमारे देश और फिर दुनिया मे फैलने मे कितना वक्त लगता है......

2 टिप्‍पणियां:

  1. हम उज्जैनवासी इस संकट को साक्षात भुगत रहे हैं… लेकिन फ़िर भी लोग सुधरने को तैयार नहीं है इधर…

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काशिफ आरिफ

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